Saturday, 9 May 2015

आम का परिचय अथवा इतिहास, प्रजातियाँ या गुण


आम अत्यंत उपयोगी, दीर्घजीवी, सघन तथा विशाल वृक्ष है, जो भारत में दक्षिण में कन्याकुमारी से उत्तर में हिमालय की तराई तक (3,000 फुट की ऊँचाई तक) तथा पश्चिम में पंजाब से पूर्व में आसाम तक, अधिकता से होता है। अनुकूल जलवायु मिलने पर इसका वृक्ष 50-60 फुट की ऊँचाई तक पहुँच जाता है। वनस्पति वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार आम ऐनाकार्डियेसी कुल का वृक्ष है। आम के कुछ वृक्ष बहुत ही बड़े होते हैं।

अनुक्रम

परिचय

मोजर (फूल) लगा हुआ आम का वृक्ष
आम का वृक्ष एक फूलदार, बड़ा स्थलीय वृक्ष है। इसमें दो बीजपत्र होते हैं। इसके फूल छोटे-छोटे एवं समूह में रहते हैं। इसे मंजरी कहते हैं। इसकी पत्ती सरल, लम्बी एवं भाले के समान होती है। इसका तना लम्बा एवं मजबूत होता है। इसका फल एक गुठलीवाला सरस और गूदेदार होता है। आम का फल विश्वप्रसिद्ध स्वादिष्ट फल है। इसे फलों का राजा कहा गया हैं।
आम का वृक्ष बड़ा और खड़ा अथवा फैला हुआ होता है; ऊँचाई 30 से 90 फुट तक होती है। छाल खुरदरी तथा मटमैली या काली, लकड़ी कठीली और ठस होती है। इसकी पत्तियाँ सादी, एकांतरित, लंबी, प्रासाकार (भाले की तरह) अथवा दीर्घवृत्ताकार, नुकीली, पाँच से 16 इंच तक लंबी, एक से तीन इंच तक चौड़ी, चिकनी और गहरे हरे रंग की होती हैं; पत्तियों के किनारे कभी-कभी लहरदार होते हैं। वृंत (एँठल) एक से चार इंच तक लंबे, जोड़ के पास फूले हुए होते हैं। पुष्पक्रम संयुत एकवर्ध्यक्ष (पैनिकिल), प्रशाखित और लोमश होता है। फूल छोटे, हलके बसंती रंग के या ललछौंह, भीनी गंधमय और प्राय: एँठलरहित होते हैं; नर और उभयलिंगी दोनों प्रकार के फूल एक ही बार (पैनिकिल) पर होते हैं। बाह्मदल (सेपल) लंबे अंडे के रूप के, अवतल (कॉनकेव); पंखुडियाँ बाह्मदल की अपेक्षा दुगुनी बड़ी, अंडाकार, तीन से पाँच तक उभड़ी हुई नारंगी रंग की धारियों सहित; बिंब (डिस्क) मांसल, पाँच भागशील (लोब्ड); एक परागयुक्त (फ़र्टाइल) पुंकेसर, चार छोटे और विविध लंबाइयों के बंध्य पुंकेसर (स्टैमिंनोड); परागकोश कुछ कुछ बैंगनी और अंडाशय चिकना होता है। फल सरस, मांसल, अष्ठिल, तरह तरह की बनावट एवं आकारवाला, चार से 25 सेंटीमीटर तक लंबा तथा एक से 10 सेंटीमीटर तक घेरेवाला होता है। पकने पर इसका रंग हरा, पीला, जोगिया, सिंदुरिया अथवा लाल होता है। फल गूदेदार, फल का गूदा पीला और नारंगी रंग का तथा स्वाद में अत्यंत रुचिकर होता है। इसके फल का छिलका मोटा या कागजी तथा इसकी गुठली एकल, कठली एवं प्राय: रेशेदार तथा एकबीजक होती है। बीज बड़ा, दीर्घवत्, अंडाकार होता है।
आम लक्ष्मीपतियों के भोजन की शोभा तथा गरीबों की उदरपूर्ति का अति उत्तम साधन है। पके फल को तरह तरह से सुरक्षित करके भी रखते हैं। रस का थाली, चकले, कपड़े इत्यादि पर पसार, धूप में सुखा "अमावट" बनाकर रख लेते हैं। यह बड़ी स्वादिष्ट होती है और इसे लोग बड़े प्रेम से खाते हैं। कहीं कहीं फल के रस को अंडे की सफेदी के साथ मिलाकर अतिसार और आँवे के रोग में देते हैं। पेट के कुछ रोगों में छिलका तथा बीज हितकर होता है। कच्चे फल को भूनकर पना बना, नमक, जीरा, हींग, पोदीना इत्यादि मिलाकर पीते हैं, जिससे तरावट आती है और लू लगने का भय कम रहता है। आम के बीज में मैलिक अम्ल अधिक होता है और यह खूनी बवासीर और प्रदर में उपयोगी है। आम की लकड़ी गृहनिर्माण तथा घरेलू सामग्री बनाने के काम आती है। यह ईधन के रूप में भी अधिक बरती जाती है। आम की उपज के लिए कुछ कुछ बालूवाली भूमि, जिसमें आवश्यक खाद हो और पानी का निकास ठीक हो, उत्तम होती है। आम की उत्तम जातियों के नए पौधे प्राय: भेंटकलम द्वारा तैयार किए जाते हैं। कलमों और मुकुलन (बर्डिग) द्वारा भी ऐसी किस्में तैयार की जाती हैं। बीजू आमों की भी अनेक बढ़िया जातियाँ हैं, परतु इनमें विशेष असुविधा यह है कि इस प्रकार उत्पन्न आमों में वांछित पैतृक गुण कभी आते हैं, कभी नहीं ; इसलिए इच्छानुसार उत्तम जातियाँ इस रीति से नहीं मिल सकतीं। आम की विशेष उत्तम जातियों में वाराणसी का लँगड़ा, बंबई का अलफांजो तथा मलीहाबाद और लखनऊ के दशहरी तथा सफेदा उल्लेखनीय हैं।

इतिहास

आम का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। डी कैडल (सन् 1844) के अनुसार आम्र प्रजाति (मैंजीफ़ेरा जीनस) संभवत: बर्मा, स्याम तथा मलाया में उत्पन्न हुई; परंतु भारत का आम, मैंजीफ़ेरा इंडिका, जो यहाँ, बर्मा और पाकिस्तान में जगह जगह स्वयं (जंगली अवस्था में) होता है, बर्मा-आसाम अथवा आसाम में ही पहले पहल उत्पन्न हुआ होगा। भारत के बाहर लोगों का ध्यान आम की ओर सर्वप्रथम संभवत: बुद्धकालीन प्रसिद्ध यात्री, हुयेनत्सांग (632-45,) ने आकर्षित किया।
फ़्रायर (सन् 1673) ने आम को आडू और खूबानी से भी रुचिकर कहा है और हैमिल्टन (सन् 1727) ने गोवा के आमों को बड़े, स्वादिष्ट तथा संसार के फलों में सबसे उत्तम और उपयोगी बताया है। भारत के निवासियों में अति प्राचीन काल से आम के उपवन लगाने का प्रेम है। यहाँ की उद्यानी कृषि में काम आनेवाली भूमि का 70 प्रतिशत भाग आम के उपवन लगाने के काम आता है। स्पष्ट है कि भारतवासियों के जीवन और अर्थव्यवस्था का आम से घनिष्ठ संबंध है। इसके अनेक नाम जैसे सौरभ, रसाल, चुवत, टपका, सहकार, आम, पिकवल्लभ आदि भी इसकी लोकप्रियता के प्रमाण हैं। इसे "कल्पवृक्ष" अर्थात् मनोवाछिंत फल देनेवाला भी कहते हैं शतपथ ब्राह्मण में आम की चर्चा इसकी वैदिक कालीन तथा अमरकोश में इसकी प्रशंसा इसकी बुद्धकालीन महत्ता के प्रमाण हैं। मुगल सम्राट् अकबर ने "लालबाग" नामक एक लाख पेड़ोंवाला उद्यान दरभंगा के समीप लगवाया था, जिससे आम की उस समय की लोकप्रियता स्पष्ट हैं। भारतवर्ष में आम से संबंधित अनेक लोकगीत, आख्यायिकाएँ आदि प्रचलित हैं और हमारी रीति, व्यवहार, हवन, यज्ञ, पूजा, कथा, त्योहार तथा सभी मंगलकायाँ में आम की लकड़ी, पत्ती, फूल अथवा एक न एक भाग प्राय: काम आता है। आम के बौर की उपमा वसंतद्तसे तथा मंजरी की मन्मथतीर से कवियों ने दी है। उपयोगिता की दृष्टि से आम भारत का ही नहीं वरन् समस्त उष्ण कटिबंध के फलों का राजा है और बहुत तरह से उपयोग होता है। कच्चे फल से चटनी, खटाई, अचार, मुरब्बा आदि बनाते हैं। पके फल अत्यंत स्वादिष्ट होते हैं और इन्हें लोग बड़े चाव से खाते हैं। ये पाचक, रेचक और बलप्रद होते हैं।
कालिदास ने इसका गुणगान किया है, सिकंदर ने इसे सराहा और मुग़ल सम्राट अकबर ने दरभंगा में इसके एक लाख पौधे लगाए। उस बाग़ को आज भी लाखी बाग़ के नाम से जाना जाता है। वेदों में आम को विलास का प्रतीक कहा गया है। कविताओं में इसका ज़िक्र हुआ और कलाकारों ने इसे अपने कैनवास पर उतारा। भारत में गर्मियों के आरंभ से ही आम पकने का इंतज़ार होने लगता है। आँकड़ों के मुताबिक इस समय भारत में प्रतिवर्ष एक करोड़ टन आम पैदा होता है जो दुनिया के कुल उत्पादन का ५२ प्रतिशत है। आम भारत का राष्ट्रीय फल भी है।[1] अन्तर्राष्ट्रीय आम महोत्सव, दिल्ली में इसकी अनेक प्रजातियों को देखा जा सकता है।[2] भारतीय प्रायद्वीप में आम की कृषि हजारों वर्षों से हो रही है।[3] यह ४-५ ईसा पूर्व पूर्वी एशिया में पहुँचा। १० वीं शताब्दी तक यह पूर्वी अफ्रीका पहुँच चुका था।[3] उसके बाद आम ब्राजील, वेस्ट इंडीज और मैक्सिको पहुँचा क्योंकि वहाँ की जलवायु में यह अच्छी तरह उग सकता था।[3] १४वीं शताब्दी में मुस्लिम यात्री इब्नबतूता ने इसकी सोमालिया में मिलने की पुष्टि की है।[4] तमिलनाडु के कृष्णगिरि के आम बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं और दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।

प्रजातियाँ

मुख्य लेख:आम की किस्में
उद्यान में लगाए जानेवाले आम की लगभग 1,400 जातियों से हम परिचित हैं। इनके अतिरिक्त कितनी ही जंगली और बीजू किस्में भी हैं। गंगोली आदि (सन् 1955) ने 210 बढ़िया कलमी जातियों का सचित्र विवरण दिया है। विभिन्न प्रकार के आमों के आकार और स्वाद में बड़ा अंतर होता है। कुछ बेर से भी छोटे तथा कुछ, जैसे सहारनपुर का हाथीझूल, भार में दो ढाई सेर तक होते हैं। कुछ अत्यंत खट्टे अथवा स्वादहीन या चेप से भरे होते हैं, परंतु कुछ अत्यंत स्वादिष्ट और मधुर होते हैं।
भारत में उगायी जाने वाली आम की किस्मों में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, फज़ली, बम्बई ग्रीन, बम्बई, अलफ़ॉन्ज़ो, बैंगन पल्ली, हिम सागर, केशर, किशन भोग, मलगोवा, नीलम, सुर्वन रेखा, वनराज, जरदालू हैं। नई किस्मों में, मल्लिका, आम्रपाली, रत्ना, अर्का अरुण, अर्मा पुनीत, अर्का अनमोल तथा दशहरी-५१ प्रमुख प्रजातियाँ हैं। उत्तर भारत में मुख्यत: गौरजीत, बाम्बेग्रीन, दशहरी, लंगड़ा, चौसा एवं लखनऊ सफेदा प्रजातियाँ उगायी जाती हैं।[5]

गुण

आम, विभिन्न अवस्थाएँ, चौकोर कटा, सामने, तिरछा और कटा।
आर्युर्वैदिक मतानुसार आम के पंचांग (पाँच अंग) काम आते हैं। इस वृक्ष की अंतर्छाल का क्वाथ प्रदर, खूनी बवासीर तथा फेफड़ों या आँत से रक्तस्राव होने पर दिया जाता है। छाल, जड़ तथा पत्ते कसैले, मलरोधक, वात, पित्त तथा कफ का नाश करनेवाले होते हैं। पत्ते बिच्छू के काटने में तथा इनका धुआँ गले की कुछ व्याधियों तथा हिचकी में लाभदायक है। फूलों का चूर्ण या क्वाथ आतिसार तथा संग्रहणी में उपयोगी कहा गया है। आम का बौर शीतल, वातकारक, मलरोधक, अग्निदीपक, रुचिवर्धक तथा कफ, पित्त, प्रमेह, प्रदर और अतिसार को नष्ट करनेवाला है। कच्चा फल कसैला, खट्टा, वात पित्त को उत्पन्न करनेवाला, आँतों को सिकोड़नेवाला, गले की व्याधियों को दूर करनेवाला तथा अतिसार, मूत्रव्याधि और योनिरोग में लाभदायक बताया गया है। पका फल मधुर, स्निग्ध, वीर्यवर्धक, वातनाशक, शीतल, प्रमेहनाशक तथा व्रण श्लेष्म और रुधिर के रोगों को दूर करनेवाला होता है। यह श्वास, अम्लपित्त, यकृतवृद्धि तथा क्षय में भी लाभदायक है।
आधुनिक अनुसंधानों के अनुसार आम के फल में विटामिन ए और सी पाए जाते हैं। अनेक वैद्यों ने केवल आम के रस और दूध पर रोगी को रखकर क्षय, संग्रहणी, श्वास, रक्तविकार, दुर्बलता इत्यादि रोगों में सफलता प्राप्त की है। फल का छिलका गर्भाशय के रक्तस्राव, रक्तमय काले दस्तों में तथा मुँह से बलगम के साथ रक्त जाने में उपयोगी है। गुठली की गरी का चूर्ण (मात्रा 2 माश) श्वास, अतिसार तथा प्रदर में लाभदायक होने के सिवाय कृमिनाशक भी है।
पका आम बहुत स्वास्थ्यवर्धक, पोषक, शक्तिवर्धक और चरबी बढ़ाने वाला होता है। आम का मुख्य घटक शर्करा है, जो विभिन्न फलों में ११ से २० प्रतिशत तक विद्यमान रहती है। शर्करा में मुख्यतया इक्षु शर्करा होती है, जो कि आम के खाने योग्य हिस्से का ६.७८ से १६.९९ प्रतिशत है। ग्लूकोज़ व अन्य शर्करा १.५३ से ६.१४ प्रतिशत तक रहती है। अम्लों में टार्टरिक अम्ल व मेलिक अम्ल पाया जाता है, इसके साथ ही साथ साइट्रिक अम्ल भी अल्प मात्रा में पाया जाता है। इन अम्लों का शरीर द्वारा उपयोग किया जाता है और ये शरीर में क्षारीय संचय बनाए रखने में सहायक होते हैं। आम के अन्य घटक इस प्रकार हैं- प्रोटीन ९.६, वसा ०.१, खनिज पदार्थ ०.३ रेशा, १.१ फॉसफोरस ०.०२ और लौह पदार्थ ०.३ प्रतिशत। नमी की मात्रा ८६ प्रतिशत है। आम का औसत ऊर्जा मूल्य प्रति १०० ग्राम में लगभग ५० कैलोरी है। मुंबई की एक किस्म का औसत ऊर्जा मूल्य प्रति १०० ग्राम ९० कैलोरी है। यह विटामिन ‘सी’ के महत्त्वपूर्ण स्रोतों में से एक है और इसमें विटामिन ‘ए’ भी प्रचुर मात्रा में है।[6]

आम पर लगने वाले रोग

आम के अनेक शत्रु हैं। इनमें ऐनथ्रै कनोस, जो कवकजनित रोग है और आर्द्रताप्रधान प्रदेशों में अधिक होता है, पाउडरी मिल्डिउ, जो एक अन्य कवक से उत्पन्न होनेवाला रोग है तथा ब्लैक टिप, जो बहुधा ईट चूने के भट्ठों के धुएँ के संसर्ग से होता है, प्रधान हैं। अनेक कीड़े मकोड़े भी इसके शत्रु हैं। इनमें मैंगोहॉपर, मैंगो बोरर, फ्रूट फ़्लाई और दीमक मुख्य हैं। जल-चूना-गंधक-मिश्रण, सुर्ती का पानी तथा संखिया का पानी इन रोगों में लाभकारी होता है।

इन्हें भी देखें

संदर्भ


  • "अपने देश को जानो" (एचटीएम). हिन्दी नेस्ट. अभिगमन तिथि: २००९.

  • "आम फलों का राजा" (एसएचटीएमएल). बीबीसी. अभिगमन तिथि: २००९.
  • "उद्यान विज्ञान" (एचटीएमएल). विज्ञान केन्द्र धुरा, उन्नाव. अभिगमन तिथि: २००९.

    1. "फलों और सब्जियों से चिकित्सा" (पीएचपी). भारतीय साहित्य संग्रह. अभिगमन तिथि: २००९.

    बाहरी कड़ियाँ

    पपीता का परिचय अथवा चित्रदीर्घा

    पपीता एक फल है। कच्ची अवस्था में यह हरे रंग का होता है और पकने पर पीले रंग का हो जाता है। इसके कच्चे और पके फल दोनों ही उपयोग में आते हैं। कच्चे फलों की सब्जी बनती है। इन कारणों से घर के पास लगाने के लिये यह बहुत उत्तम फल है।
    चित्र:Carica papaya - Köhler–s Medizinal-Pflanzen-029.jpgइसके कच्चे फलों से दूध भी निकाला जाता है, जिससे पपेइन तैयार किया जाता है। पपेइन से पाचन संबंधी औषधियाँ बनाई जाती हैं पपीता पाचन शक्ति को बढ़ाता है। अत: इसके पक्के फल का सेवन उदरविकार में लाभदायक होता है। पपीता सभी उष्ण समशीतोष्ण जलवायु वाले प्रदेशों में होता है।


    अनुक्रम

    परिचय     

    भारत में पपीता अब से लगभग ३०० वर्ष पूर्व आया। आरंभ में भारतवासियों ने फलों में हीक के कारण इसको कदाचित् अधिक पसंद नहीं किया, परंतु अब अच्छी और नई किस्मों के फलों में हीक नहीं होती।
    शीघ्र फलनेवाले फलों में पपीता अत्यंत उत्तम फल है। पेड़ लगाने के बाद वर्ष भर के अंदर ही यह फल देने लगता है। इसके पेड़ सुगमता से उगाए जा सकते हैं और थोड़े से क्षेत्र में फल के अन्य पेड़ों की अपेक्षा अधिक पेड़ लगते हैं।
    इसके पेड़ कोमल होते हैं और पाले से मर जाते हैं। ऐसे स्थानों में जहाँ शीतकाल में पाला पड़ता हो, इसको नहीं लगाना चाहिए। यहाँ उपजाऊ, दुमट भूमि में अच्छा फलता है। ऐसे स्थानों में जहाँ पानी भरता हो, पपीता नहीं बढ़ता। पेड़ के तने के पास यदि पानी भरता है तो इसका तना गलने लगता है। पपीते के खेत में पानी का निकास अच्छा होना चाहिए। इसका बीज मार्च से जून तक बोना चाहिए। प्राय: अप्रैल मई में बीज बोते हैं और जुलाई अगस्त में पेड़ लगाते हैं। यदि सिंचाई का सुप्रबंध हो तो फरवरी मार्च में इसका पेड़ लगाना अति उत्तम होता है। पेड़ लगाने के लिये पहले आठ या दस फुट के फासले से डेढ़ या दो फुट गहरे गोल गड्ढे खोद लेने चाहिए। गड्ढे के केंद्र में पेड़ लगाना चाहिए। पेड़ों की सिंचाई के लिये उनमें छल्लेदार थाले बनाकर आवश्यकतानुसार पानी देते रहना चाहिए।
    पपीते के पेड़ों में नर एवं मादा पेड़ अलग होते हैं। नर पेड़ों में केवल लंबे-लंबे फूल आते हैं। इनमें फल नहीं लगते। जब पेड़ फलने लगते हैं तो केवल १० प्रतिशत नर पेड़ों को छोड़कर अन्य सब नर पेड़ों को उखाड़ फेंकना चाहिए।
    पपीते के पेड़ में तीन या चार साल तक ही अच्छे फल लगते हैं। आवश्यकतानुसार यदि तीसरे चौथे साल पपीते के दो पेड़ों के बीच बीच में नए पेड़ लगते रहें तो चौथे पाँचवें साल नए फलनेवाले पेड़ तैयार होते जाते हैं। नए पेड़ तैयार हो जाने पर पुराने पेड़ों को उखाड़ फेंकना चाहिए। इसकी मुख्य किस्में हनीड्यू (मधुविंदु), सिलोन, राँची आदि हैं।

    चित्रदीर्घा

     

             


     

     

     

     

     

     

     

     

     

    संदर्भ

    बाहरी कड़ियाँ

     

     

    Friday, 8 May 2015

    औद्यानिकी (Horticulture) के विकाश की विधिया तथा औद्यानिकी से सम्बन्धित क्रियाएँ


    औद्यानिकी (Horticulture):  उद्यान विज्ञानमें फल, सब्जी तथा फूल, सभी का उगाना सम्मिलित है। इन पादपों के उगाने की कला के अंतर्गत बहुत सी क्रियाएँ आ जाती हैं।



    प्रजनन

    उद्यानविज्ञान में सबसे महत्व का कार्य है अधिक से अधिक संख्या में मनचाही जातियों के पादप उगाना। उगाने की दो विधियाँ हैं-लैंगिक (सेक्सुअल) और अलैंगिक (असेक्सुअल)।

    लैंगिक प्रजनन

    बीज द्वारा फूल तथा तरकारी का उत्पादन सबसे साधारण विधि है। यह लैंगिक उत्पादन का उदाहरण है। फलों के पेड़ों में इस विधि से उगाए पौधों में अपने पिता की तुलना में बहुधा कुछ न कुछ परिवर्तन देखने में आता है। इसलिए पादपों की नवीन समुन्नत जातियों का उत्पादन (कुछ गौण विधियों को छोड़कर) लैंगिक विधि द्वारा ही संभव है।
    पादपों के अंकुरित होने पर निम्नलिखित का प्रभाव पड़ता है : बीज, पानी, उपलब्ध आक्सीजन, ताप और बीज की आयु तथा परिपक्वता।

    अलैंगिक या वानस्पतिक प्रजनन

    पौधा बेचनेवाली (नर्वरीवालों) तथा फलों की खेती करनेवालों के लिए वानस्पतिक विधियों से प्रजनन बहुत उपयोगी सिद्ध होता है, मुख्य रूप से इसलिए कि इन विधियों से वृक्ष सदा वांछित कोटि के ही उपलब्ध होते हैं। इन विधियों को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है।

    कर्तन (Shearing)

    पादप के ही किसी भाग से, जेसे जड़, गाँठ (रिज़ोम), कंद, पत्तियों या तने से, अँखुए के साथ या बिना अँखुए के ही, नए पादप उगाना कर्तन (कटिंग) लगाना कहलाता है। रोपने पर इन खंडों में से ही जड़ें निकल आती हैं और नए पादप उत्पन्न हो जाते हैं। अधिक से अधिक पादपों को उगाने की प्राय: यही सबसे सस्ती, शीघ्र और सरल विधि है। टहनी के कर्तन लगाने को माली लोग "खँटी गाड़ना" कहते हैं। कुछ लोग इसे "कलम लगाना" भी कहते हैं, परंतु कलम शब्द का प्रयोग उसी संबंध में उचित है जिसमें एक पादप का अंग दूसरे की जड़ पर चढ़ाया जाता है।

    उपरोपण (Graft)

    इसमें चढ़ कलम (ग्रैफ्टिंग), भेद कलम (इनाचिंग) और चश्मा (बडिंग) तीनों सम्मिलित हैं। माली लोग चढ़ कलम और भेट कलम दोनों को साटा कहते हैं। इन लोगों में चश्मा के लिए चश्मा शब्द फारसी चश्म से निका है, जिसका अर्थ आँख है। इन तीनों रीतियों में एक पौधे का कोई अंग दूसरे पौधे की जड़ पर उगता है। पहले को उपरोपिका (सायन) कहते हैं; दूसरे को मूल वृंत (रूट स्टाक)। उपरोपण में प्रयुक्त दोनों पौधों को स्वस्थ होना चाहिए। कलम की विधि केवल ऐसे पादपों के लिए उपयुक्त होती है जिनमें ऊपरी छिलकेवाली पर्त और भीतरी काठ के बीच एक स्पष्ट एधास्तर (कैंबिअम लेयर) होता है, क्योंकि यह विधि उपरोपिका और मूल वृंत के एधास्तरों के अभिन्न है। कलम लगाने का कार्य वैसे तो किसी महीने में किया जा सकता है, फिर भी यदि ऋतु अनुकूल हो और साथ ही अन्य आवश्यक परिस्थितियाँ भी अनुकूल हों, तो अधिक सफलता मिलने की संभावना रहती है। यह आवश्यक है कि जुड़नेवाले अंग चिपककर बैठें। उपरोपिका का एधास्तर मूल वृंत के एधास्तर को पूर्ण रूप से स्पर्श करे। वसंत ऋतु के प्रारंभ में यह स्तर अधिकतम सक्रिय हो जाता है, इस ऋतु में उसके अँखुए बढ़ने लगते हैं और किशलय (नए पत्ते) प्रस्फुटित होते हैं। जिन देशों में गर्मी के बाद पावस (मानसून) से पानी बरसता है वहाँ गर्मी की शुष्क ऋतु के बाद बरसात आते ही क्रियाशीलता का द्वितीय काल आता है। इन दोनों ऋतुओं में क्षत सर्वाधिक शीघ्र पूरता है तथा मूल वृंत एवं उपरोपिका का संयोग सर्वाधिक निश्चित होता है। पतझड़ वाले पादपों में कलम उस समय लगाई जाती है जब वे सुप्तावस्था में होते है।

    कलम लगाने की विधियाँ

    1. शिरोबंधन, 2. शिर तथा जिह्वाबंधन; 3. पैवंद; 4. अँगूठीनुमा चश्मा; 5. उपरोपिका बंधन; 6. काठी कलम; 7. साधारण चश्मा।

     1. शिरोबंधन (स्प्लाइस या ह्विप ग्रैफ्टिंग) : यह कलम लगाने की सबसे सरल विधि है। इस विधि में उपरोपिका तथा मूलवृंत के लिए एक ही व्यास के तने चुने जाते हैं (प्राय: 1/4इंच से 1/2इंच तक के)। फिर दोनों को एक ही प्रकार से तिरछा काट दिया जाता है। कटान की लंबाई लगभग 1.5 इंच रहती है। फिर दोनों को दृढ़ता से बाँधकर ऊपर से मोम चढ़ा दिया जाता है। बाँधने के लिए माली लोग केले के पेड़ के तने से छिलके से 1/8 इंच चौड़ी पट्टी चीरकर काम में लाते हैं, परंतु कच्चे (बिना बटे) सूत से भी काम चल सकता है।

     
    छँटाई (प्रूनिंग) : इसके अंतर्गत लता तथा टहनियों को आश्रय देने की रीति और उनकी काट-छाँट दोनों ही आती हैं। पहली बात के सहारे पादपों को इच्छानुसार रूप दिया जा सकता है। आलंकारिक पादपों के लिए छँटाई करनेवाले की इच्छा के अनुसार शंक्वाकार (गावदुम), छत्राकार (छतरीनुमा) आदि रूप दिया जा सकता है और कभी-कभी तो उन्हें हाथी, घोड़े आदि का रूप भी दे दिया जाता है, परंतु फलों के वृक्षों को साधारणत: कलश या पुष्पपात्र का रूप दिया जाता है और केंद्रीय भाग को घना नहीं होने दिया जाता

     
    अंतर्कृषि : यदि पादपों की परस्पर दूरी ठीक है तो फलों के नए उद्यान में बहुत सी भूमि ऐसी पड़ी रहेगी जो वर्षों तक फलवाले वृक्षों के काम में न आएगी। इस भूमि में शीघ्र उत्पन्न होनेवाले फल, जैसे पपीता, या कोई तरकारी पैदा की जा सकती है।

    सिंचाई: भिन्न-भिन्न प्रकार के पादपों को इतनी विभिन्न मात्राओं में पानी की आवश्यकता होती है कि इनके लिए कोई व्यापक नियम नहीं बनाया जा सकता। कितना पानी दिया जाए और कब दिया जाए, यह इस पर निर्भर है कि कौन-सा पौधा है और ऋतु क्या है। गमले में लगे पौधों को सूखी ऋतु में प्रति दिन पानी देना आवश्यक है। सभी पादपों के लिए भूमि को निरंतर नम रहना चाहिए जिससे उनकी बाढ़ न रुके। फलों के भी समुचित विकास के लिए निरंतर पानी की आवश्यकता रहती है। यह स्मरण रखना चाहिए कि भूमि में नमी मात्रा इतनी कम कभी न हो कि पौधे मुरझा जाएँ और फिर पनप न सकें। अच्छी सिंचाई वही है जिसमें पानी कम से कम मात्रा में खराब जाए। यह खराबी कई कारणों से हो सकती है : ऊपरी सतह पर से पानी के बह जाने से, अनावश्यक गहराई तक घुस जाने से, ऊपरी सतह से भाप बनकर उड़ जाने से तथा घास-पात द्वारा आवश्यक पानी खिच जाने से। पंक्तियों में लगी हुई तरकारियों की बगल को बगल की नालियों द्वारा सींचना सरल है। छोटे वृक्ष थाला बनाकर सींचे जा सकते हैं। थाले इस प्रकार आयोजित हों कि पादपों के मूल तक की भूमि सिंच जाए। जैसे-जैसे वृक्ष बढ़ते जाएँ थालों के वृत्त को बढ़ाते जाना चाहिए। बड़े से बड़े वृक्षों की सिंचाई के लिए नालियों की पद्धति ही कुछ परिवर्तित रूप में उपयोगी होती है।

     
    खाद: पादपों को उचित आहार मिलना सबसे महत्व की बात है। फल और तरकारी अन्य फसलों की अपेक्षा भूमि से अधिक मात्रा में आहार ग्रहण करते हैं। फलवाले वृक्ष तथा तरकारी के पादपों को अन्य पादपों के सदृश ही अपनी वृद्धि के लिए कई प्रकार के आहार अवयवों की आवश्यकता होती है जो साधारणत: पर्याप्त मात्रा में उपस्थित रहते हैं। परंतु कोई अवयव पादप को कितना मिल सकेगा यह कई बातों पर निर्भर है, जैसे वह अवयव मिट्टी में किस खनिज के रूप में विद्यमान है, मिट्टी का कितना अंश कलिल (कलायड) के रूप में है, मिट्टी में आद्र्रता कितनी है और उसकी अम्लता (पी एच) कितनी है। अधिकांश फसलों के लिए भूमि में नाइट्रोजन, फ़ास्फ़ोरस तथा पोटैसियम डालना उपयोगी पाया गया है, क्योंकि ये तत्व विभिन्न फसलों द्वारा न्यूनाधिक मात्रा में निकल जाते हैं। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि भूमि के इन तत्वों का संतुलन पौधों की आवश्यकता के अनुसार ही रहे। किसी एक तत्व के बहुत अधिक मात्रा में डालने से दूसरे तत्वों में कमी या असंतुलन उत्पन्न हो सकता है, जिससे उपज में कमी आ सकती है।

     
    नाइट्रोजन: भारतीय भूमि के लिए खाद के सबसे महत्वपूर्ण अंग नाइट्रोजन तथा वानस्पतिक पदार्थ हैं। यह स्मरण रहे कि भूमि-भूमि में अंतर होता है; इसलिए इस संबंध में कोई एक व्यापक नुस्खा नहीं बताया जा सकता जिसका प्रयोग सर्वत्र किया जा सके। नाइट्रोजन देनेवाली कुछ वस्तुएँ ये हैं :-(क) जीवजनिक (ऑर्गैनिक) स्रोत : गोबर, लीद, मूत्र, कूड़ा कर्कट आदि की खाद; खली तथा हरी फसलें जो खाद के रूप में काम में आ सकती हैं, जैसे सनई, तिनपतिया (क्लोवर) मूँग, ढेंचा आदि। (ख) अजीवजनित स्रोत : यूरिया, जिसमें 40 प्रतिशत नाइट्रोजन होता है, अमोनियम सल्फेट (20 प्रतिशत नाइट्रोजन), अमोनियम नाइट्रेट (35 प्रतिशत नाइट्रोजन), कैल्सियम नाइट्रेट (15 प्रतिशत नाइट्रोजन) तथा सोडियम नाइट्रेट (16 प्रतिशत नाइट्रोजन)। साधारण: भूमि में प्रति एकड़ 50 से 12 पाउंड तक नाइट्रोजन संतोषजनक होने की आशा की जा सकती है।
     
    फ़ास्फ़ोरस: यह संभव है कि फ़ास्फ़ोरस भूमि में पर्याप्त मात्रा में रहे, परंतु पादपों को केवल धीरे-धीरे प्राप्त हो। देखा गया है कि कभी-कभी जहाँ अन्य फसलें बहुत ही निकम्मी होती थीं, वहाँ फलों का उद्यान भूमि में बिना ऊपर से फ़ास्फ़ोरस पदार्थ डाले, बहुत अच्छी तरह फूलता फलता है, संभवत: इसलिए कि फल के वृक्षों को फ़ास्फ़ोरस की आवश्यकता धीरे-धीरे ही पड़ती है। खादों में तथा सभी प्रकार के जीवजनित पदार्थों में कुछ-न-कुछ फ़ास्फ़ोरस रहता है। परंतु फ़ास्फ़ोरसप्रद विशेष वस्तुएँ ये हैं-अस्थियों का चूर्ण (जिसमें 20 से 25 प्रतिशत फ़ास्फ़ोरस पेंटाक्साइड, रहता है), बेसिक स्लैग (15 से 20 प्रतिशत फ़ास्फ़ोरस पेंटाक्साइड) और सुपर फ़ास्फेट जिसका प्रयोग बहुतायत से होता है। इसमें 16 से 40 प्रतिशत फ़ास्फ़ोरस पेंटाक्साइड रहता है। उन मिट्टयों में, जो फ़ास्फ़ोरस को स्थिर (फ़िक्स) कर लेती हैं, पहली बार इतना फ़ास्फ़ोरसमय पदार्थ डालना चाहिए कि स्थिर करने पर भी पौधों के लिए कुछ फ़ास्फ़ोरस बचा रहे, परंतु जो मिट्टयाँ फ़ास्फ़ोरस को स्थिर नहीं करतीं उनमें अधिक मात्रा में फ़ास्फ़ोरसमय पदार्थ नहीं डालना चाहिए, अन्यथा संतुलन बिगड़ जाएगा और अन्य अवयव कम पड़ जाएँगे।
     
    पोटैशियम: जिस भूमि में सुलभ पोटैशियम की मात्रा बहुत ही कम होती है उसमें पोटैशियम देने पर दर्शनीय अंतर पड़ता है, जो उपज की वृद्धि से स्पष्ट हो जाता हे। पोटैशिअम सल्फेट तथा पोटैशियम क्लोराइड ही साधारणत: खाद के लिए प्रयुक्त होते हैं। इनमें से प्रत्येक में लगभग 50 प्रतिशत पोटैशियम आक्साइड होता है। पोटैशियम नाइट्रेट में 44 प्रतिशत पोटैशियम आक्साइड होता है; साथ में 13 प्रतिशत नाइट्रोजन भी रहता है। जीवजनित खादों में भी 50 प्रतिशत या अधिक पोटैशियम ऑक्साइड हो सकता है।

    Wednesday, 6 May 2015

    Botanical and Hindi Names of Important Crops


    Botanical Hindi (Roman) हिन्दी

    Pennisetum typhoides Bajra बाजरा

    Hordeum vulgare Jau जौ

    Echinochloa frumentacea Kutki कुतकी

    Sorghum bicolor Jowar ज्वार

    Panicum milliaceum Cheena चीना

    Panicum milliare Sawan सावन

    Setariaitalica Kangani कांगनी

    Paspalum scrobiculatum Kodon कोदन

    Zea mays Makka मक्का

    Avena sativa Jaie जेई

    Eleusine coracana Mandua मंडवा

    Oryza sativa Dhan (Chawal) धान (चावल)

    Triticum aestivum Gehun गेंहूँ

    Vigna mungo Urad उड़द

    Cicer arietinum Chana चना

    Lathyrus sativus Khesari केसरी

    Cyamopsis tetragonoloba Guar ग्वार

    Vigna unguiculata Lobia लोबिया

    Vigna radiata Mung मूंग

    Dolichos biflorus Kulthi कुल्थी

    Vigna aconitifolia Moth मोठ

    Lens culinaris Masur मसूर

    Pisum sativum var Arvense Matar मटर

    Cajanus cajan Tur, Arhar अरहर

    Glycine max Soyabean सोयाबीन

    Saccharum officinarum Ganna गन्ना

    Malus sylvestris Seb सेब

    Prunus armeniaca Khoobani खूबानी

    Anacardium occidentale Kaju काज़ू

    Ficus carica Anjeer अंजीर

    Vitis vinifera Angur अंगूर

    Psidium guajava Amrood अमरुद

    Artocarpus heterophyllus Katahal कटहल

    Citrus lemon Nimbu निंबू

    Citrus orantifolia Bara Nimbu बड़ा निंबू

    Litchi chinensis Litchi लीची

    Magnifera indica Aam आम

    Citrus reticulata Santara, Narangi संतरा, नारंगी

    Carica papaya Papeeta पपीता

    Pyrus communis Naspati नाशपाती

    Ananas comosus Ananas अनानास

    Musa paradisiaca Kela केला

    Punica granatum Anaar अनार

    Citrus sinensis Melta, Mosambi मौसमी

    Benincasa hispida Petha पेठा

    Beta vulgaris Chukandar चुकदंर

    Momordica charantia Karela करेला

    Lagenaria siceraria Lauki लौकी

    Solanum melongena Baingan बैंगन

    Brassica oleracca var., Capitata Band gobi बन्द गोभी

    Daucus carota Gajar गाजर

    Brassica oleracca var. Botrytis Phul gobi फूल गोभी

    Vigna unguiculata Lobia लोबिया

    Cucumis sativus Kheera खीरा

    Phaseolus vulgaris Faras bean फरास बीन

    Dolichos lablab Sem सेम

    Brassica oleracea var, Gongylodes Ganth gobi गाँठ गोभी

    Abelmoschus esculentus Bhindi भिंडी

    Coccinia cordifolia Kundur कुंदूर

    Cucumis melon Kharbooza खरबूज़ा

    Allium cepa Piyaz प्याज

    Trichosanthes dioica Parwal, Petal परवल

    Solanum tuberosum Aaloo आलू

    Cucurbita moschata Sitaphal, Lal Kaddu, Kumbhra सीताफल, लाल कद्दू, कुम्भड़ा

    Raphanus sativus Muli मूली

    Citrullus vulgaris var., Fistulosus Tinda टिंडा

    Cucumis melowar, momordica Phoot फूट

    Trichosanthes anguina Chachinda कचिंदा

    Lycopersicon esculentum Tamatar टमाटर

    Brassica rapa Shalgam शलगम

    Cirtrullus vulgaris Tarbooz तरबूज़

    Piper betle Paan पान

    Areca catechu Supari सुपारी

    Cannabis sativa Bhang भांग

    Papaver somniferum Afeem अफीम

    Nicotiana tabacum Nicotiana rustica Tambaku तम्बाकू

    Piper nigrum Kalimirch कालीमिर्च

    Elettaria cardamomum Chhoti lIaichi छोटी इलायची

    Capsicum annuum Lalmirch लालमिर्च

    Agriculture research institutes

    Deemed Universities

    1. ICAR-Indian Agricultural Research Institute, New Delhi
    2. ICAR-National Dairy Research Institute, Karnal
    3. ICAR-Indian Veterinary Research Institute, Izatnagar
    4. ICAR-Central Institute on Fisheries Education, Mumbai
     

    Institutions

    1. ICAR-Central Island Agricultural Research Institute , Port Blair
    2. ICAR-Central Arid Zone Research Institute, Jodhpur
    3. ICAR-Central Avian Research Institute, Izatnagar
    4. ICAR-Central Inland Fisheries Research Institute, Barrackpore
    5. ICAR-Central Institute Brackishwater Aquaculture, Chennai
    6. ICAR-Central Institute for Research on Buffaloes, Hissar
    7. ICAR-Central Institute for Research on Goats, Makhdoom
    8. ICAR-Central Institute of Agricultural Engineering, Bhopal
    9. ICAR-Central Institute for Arid Horticulture, Bikaner
    10. ICAR-Central Institute of Cotton Research, Nagpur
    11. ICAR-Central Institute of Fisheries Technology, Cochin
    12. ICAR-Central Institute of Freshwater Aquaculture, Bhubneshwar
    13. ICAR-Central Institute of Research on Cotton Technology, Mumbai
    14. ICAR-Central Institute of Sub Tropical Horticulture, Lucknow
    15. ICAR-Central Institute of Temperate Horticulture, Srinagar
    16. ICAR-Central Institute on Post harvest Engineering and Technology, Ludhiana
    17. ICAR-Central Marine Fisheries Research Institute, Kochi
    18. ICAR-Central Plantation Crops Research Institute, Kasargod
    19. ICAR-Central Potato Research Institute, Shimla
    20. ICAR-Central Research Institute for Jute and Allied Fibres, Barrackpore
    21. ICAR-Central Research Institute of Dryland Agriculture, Hyderabad
    22. ICAR-Central Rice Research Institute, Cuttack
    23. ICAR-Central Sheep and Wool Research Institute, Avikanagar, Rajasthan
    24. ICAR- Indian Institute of Soil and Water Conservation, Dehradun
    25. ICAR-Central Soil Salinity Research Institute, Karnal
    26. ICAR-Central Tobacco Research Institute, Rajahmundry
    27. ICAR-Central Tuber Crops Research Institute, Trivandrum
    28. ICAR-ICAR Research Complex for Eastern Region, Patna
    29. ICAR-ICAR Research Complex for NEH Region, Barapani
    30. ICAR-ICAR Research Complex for Goa, Ela, Old Goa, Goa
    31. ICAR-Indian Agricultural Statistics Research Institute, New Delhi
    32. ICAR-Indian Grassland and Fodder Research Institute, Jhansi
    33. ICAR-Indian Institute of Agricultural Biotechnology, Ranchi
    34. ICAR-Indian Institute of Horticultural Research, Bengaluru
    35. ICAR-Indian Institute of Natural Resins and Gums, Ranchi
    36. ICAR-Indian Institute of Pulses Research, Kanpur
    37. ICAR-Indian Institute of Soil Sciences, Bhopal
    38. ICAR-Indian Institute of Spices Research, Calicut
    39. ICAR-Indian Institute of Sugarcane Research, Lucknow
    40. ICAR-Indian Institute of Vegetable Research, Varanasi
    41. ICAR-National Academy of Agricultural Research & Management, Hyderabad
    42. ICAR-National Institute of Biotic Stresses Management, Raipur
    43. ICAR-National Institue of Abiotic Stress Management, Malegaon, Maharashtra
    44. ICAR-National Institute of Animal Nutrition and Physiology, Bengaluru
    45. ICAR-National Institute of Research on Jute & Allied Fibre Technology, Kolkata
    46. ICAR-National Institute of Veterinary Epidemiology and Disease Informatics, Hebbal, Bengaluru
    47. ICAR-Sugarcane Breeding Institute, Coimbatore
    48. ICAR-Vivekananda Parvatiya Krishi Anusandhan Sansthan, Almora
    49. ICAR-Central Institute for Research on Cattle, Meerut, Uttar Pradesh
    50. ICAR-National Institute of High Security Animal Diseases, Bhopal
    51. ICAR-Indian Institute of Maize Research,New Delhi
    52. ICAR- Central Agroforestry Research Institute , Jhansi
    53. ICAR-National Institute of Agricultural Economics and Policy Research, New Delhi
    54. ICAR-National Centre for Integrated Pest Management, New Delhi
    55. ICAR- Indian Institute of Wheat and Barley Research, Karnal
    56. ICAR- Indian Institute of Farming Systems Research, Modipuram
    57. ICAR- Indian Institute of Millets Research, Hyderabad
    58. ICAR- Indian Institute of Oilseeds Research, Hyderabad
    59. ICAR- Indian Institute of Oil Palm Research, Pedavegi, West Godawari
    60. ICAR- Indian Institute of Water Management, Bhubaneshwar
    61. ICAR- Central Institute for Women in Agriculture, Bhubaneshwar
     

    National Research Centres

    1. ICAR-National Research Centre for Banana, Trichi
    2. ICAR-National Research Centre for Citrus, Nagpur
    3. ICAR-National Research Centre for Grapes, Pune
    4. ICAR-National Research Centre for Litchi, Muzaffarpur
    5. ICAR-National Research Centre for Pomegranate, Solapur
    6. ICAR-National Research Centre on Camel, Bikaner
    7. ICAR-National Research Centre on Equines, Hisar
    8. ICAR-National Research Centre on Meat, Hyderabad
    9.. ICAR-National Research Centre on Mithun, Medziphema, Nagaland
    10. ICAR-National Research Centre on Orchids, Pakyong, Sikkim
    11. ICAR-National Research Centre on Pig, Guwahati
    12. ICAR-National Research Centre on Plant Biotechnology, New Delhi
    13. ICAR-National Research Centre on Seed Spices, Ajmer
    14. ICAR-National Research Centre on Yak, West Kemang
       

    National Bureaux

    1. ICAR-National Bureau of Plant Genetics Resources, New Delhi
    2. ICAR-National Bureau of Agriculturally Important Micro-organisms, Mau, Uttar Pradesh
    3. ICAR-National Bureau of Agricultural Insect Resources, Bengaluru
    4. ICAR-National Bureau of Soil Survey and Land Use Planning, Nagpur
    5. ICAR-National Bureau of Animal Genetic Resources, Karnal
    6. ICAR-National Bureau of Fish Genetic Resources, Lucknow
       

    Directorates 

    1. ICAR-Directorate of Rice Research, Hyderabad
    2. ICAR-Directorate of Seed Research, Mau
    3. ICAR-Directorate of Groundnut Research, Junagarh
    4. ICAR-Directorate of Soybean Research, Indore
    5. ICAR-Directorate of Rapeseed & Mustard Research, Bharatpur
    6. ICAR-Directorate of Mushroom Research, Solan
    7. ICAR-Directorate on Onion and Garlic Research, Pune
    08. ICAR-Directorate of Cashew Research, Puttur
    09. ICAR-Directorate of Medicinal and Aromatic Plants Research, Anand
    10. ICAR-Directorate of Floricultural Research, Pune, Maharashtra
    11. ICAR-Directorate of Weed Science Research, Jabalpur
    12. ICAR-Project Directorate on Foot & Mouth Disease, Mukteshwar
    13. ICAR-Directorate of Poultry Research, Hyderabad
    14. ICAR-Directorate of Knowledge Management in Agriculture (DKMA), New Delhi
    15. ICAR-Directorate of Cold Water Fisheries Research, Bhimtal, Nainital
       

    Monday, 4 May 2015

    ट्रैक्टर (कर्षित्र): आधुनिक कृषि के उपयोग में आने वाला प्रमुख उपकरण है।

    ट्रैक्टर (कर्षित्र)  आधुनिक कृषि के उपयोग में आने वाला प्रमुख उपकरण है। यह एक ऐसी गाड़ी है जो कम चाल पर अधिक कर्षण बल (ट्रैक्टिव इफर्ट) प्रदान करने के लिये डिजाइन की गयी होती है। यह अपने पीछे जुडी हुई कृषि उपकरण, सामान लदी ट्रैलर, ट्राली आदि खींचने का कार्य भी करता है। इसके उपर कुछ ऐसे कृषि उपकरण भी लगाये जाते हैं जिन्हें ट्रैक्टर से प्राप्त शक्ति से चलाया जाता

    परिचय

    कर्षित्र (Tractor) वह स्वयंचालित (self-propelled) यंत्र है। इसका व्यवहार मुख्यत:
    • 1. कर्षण (tractive) कार्य, जैसे चल यंत्रों के खींचने और
    • 2. स्थिर कार्य (stationary work), जैसे पट्टक घिरनी आदि उपकरणों की सहायता से स्थिर या चल यंत्रों के यंत्रविन्यास (mechanism) को चलने के लिये होता है।
    साधारणत: कर्षण कार्य ये हैं:
    (क) जमीन को जोतकर तैयार करना,
    (ख) बीज डालना,
    (ग) पौध लगाना,
    (घ) फसल लगाना,
    (ड) फसल काटना, आदि।
    स्थिर कार्य ये हैं:
    (क) जल को पंप करना,
    (ख) गाहना (threshing),
    (ग) भरण पेषण (Feed Grinding),
    (घ) लकड़ी चीरना, आदि।
    विभिन्न प्रकर के कार्यों के लिये पाँच प्रकार मुख्य मूल चालक (prime movers) निम्नलिखित हैं: 1. घरेलू जानवर,
    2. वायुचालित यंत्र,
    3. जलचालित यंत्र,
    4. विद्युच्चालित यंत्र,
    5. उष्माइंजन (heat engines)
    है। 

    लाभ

    घरेलू पशुओं की तुलना में ट्रैक्टर के मुख्य लाभ ये हैं:
    1. इससे कठिन कार्य लगातार लिया जा सकता है,
    2. प्रतिकूल जलवायु का इसपर प्रभाव नहीं पड़ता,
    3. यह विभिन्न गतियों

    ट्रैक्टर का इतिहास

    चित्र:Harrison Machine Works 1882 tractor.JPG
    १८८२ में 'हैरिसन मशीन वर्क्स' द्वारा निर्मित वाष्पचालित ट्रैक्टर

    १९०३ के आसपास हस्त-निर्मित पेट्रोलचालित ट्रैक्टर

    वाष्पचालित 'ब्लैक लेडी' ट्रैक्टर (१९११)
    सबसे पहले शक्ति-चालित कृषि उपकरण उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में आये। इनमें पहियों पर जड़ा एक वाष्प-इंजिन हुआ करता था। एक बेल्ट की सहायता से यह सम्बन्धित कृषि उपकरण को चलाता था। इन्हीं मशीनों में तकनीकी सुधार और विकास के परिणामस्वरूप सन १८५० के आसपास पहला ट्रैक्टर का अविर्भाव हुआ। इसके बाद इनका कृषि कार्यों में जमकर प्रयोग हुआ। ट्रैक्टरों में वाष्प-चालित इंजन बीसवीं शताब्दी में भी बहुत वर्षों तक आते रहे। जब आन्तरिक ज्वलन इन्जन (इन्टर्नल कम्बश्शन इंजिन) पर्याप्त रूप से विश्वसनीय बनने लगे तब इस नयी प्रौद्योगिकी पर आधारित ट्रैक्टरों ने पुरानी प्रौद्योगिकी का स्थान ले लिया।
    सन १८९२ में जान फ्रोलिक ने पहला पेट्रोल चालित ट्रैक्टर बनाया। इसके केवल दो ही ट्रैक्टर बिके। इसके बाद सन १९११ में ट्विन सिटी ट्रैक्टर इंजन कम्पनी ने एक डिजाइन विकसित की जो सफल रही।
    भाप इंजन का आविष्कार एवं विकास अंतर्दहन इंजन से एक सौ वर्ष पहले हुआ था। उस समय ट्रैक्टर का व्यवहार केवल गाहने की मशीन (thresher) के चलाने में किया जाता था। भाप ट्रैक्टर में कुछ विकास होने के बाद इसका व्यवहार खेत को तैयार करने, बीज बोने और फसल काटने के लिए किया जाने लगा। कृषि के लिए भाप ट्रैक्टर उपयोगी सिद्ध नहीं हुआ, क्योंकि यह अत्यंत भारी एवं मंदगतिगामी (slow moving) था। इसके अतिरिक्त इसके लिय प्रचुर मात्रा में ईंधन एवं वाष्पित्र जल की अवश्यकता होती थी जिसकी देखभाल के लिए दूसरे आदमी की आवश्यता पड़ती थी।
    भाप-ट्रैक्टर की इन त्रुटियों के कारण अन्वेषकों का ध्यान अंतर्दहन इंजन की ओर आकर्षित हुआ। 19वीं शताब्दी के अंत में प्रथम गैस ट्रैक्टर का निर्माण किया गया। 1905 ई. तक गैस ट्रैक्टर का व्यवहार खेतों में होने लगा। इसमें चार पहियों पर स्थित भारी पंजर (frame) पर एक बड़ा सिलिंडर गैस ईजंन लगा हुआ था। भाप ट्रैक्टर की तरह यह भी भारी भरकम था। इसमें ईंधन, जल आदि कम मात्रा में लगता था और एक ही आदमी पूरे यंत्र को नियंत्रित और संचालित कर सकता था। 1910 ईं. के लगभग अभिकल्पियों का ध्यान हल्के गैस ट्रैक्टर के निर्माण की ओर गया। 1913 ई. से दो एवं चार सिलिंडरोंवाले इंजन के हल्के गैस ट्रैक्टरों का निर्माण किया जाने लगा। उसके बाद विभिन्न प्रकर के गैस ट्रैक्टर का निर्माण किया जाने लगा, तब विभिन्न प्रकार के गैस ट्रैक्टर बनाए गए।
    प्रथम डीजल इंजन युक्त ट्रैक्टर का निर्माण 1931 ई. में किया गया। यद्यपि इस तरह के ट्रैक्टर का दाम अधिक था। फिर भी अनेक गुणों के कारण इसकी माँग अधिक थी। ट्रैक्टर में निम्नदाब वायवीय टायर का व्यवहार सर्वप्रथम 1932 ई. में हुआ था। आजकल भी ट्रैक्टर के विकास के लिये अन्वेषण कार्य हो रहे हैं।
    से कार्य कर सकता है,

    ट्रैक्टर के प्रकार

    कर्षण एवं स्वयंचालन के तरीकों के अनुसार

    कर्षण एवं स्वयंचालन (self-propulsion) के तरीकों के अनुसार ट्रैक्टर के दो भेद हैं:
    1. चक्र टैक्टर (Wheel tractor)- यह ट्रैक्टर बड़े महत्व का और कृषि संबंधी कार्यों के लिये अत्यंत उपयोगी है। चक्र ट्रैक्टर या तो तीन पहिएवाला होता है या चार पहिएवाला।
    2. लीक प्रकार के ट्रैक्टर (Track-type tractor) ऐसे ट्रैक्टर के कर्षण यंत्र विन्यास में दो भारी पटरियाँ (Tracks) लगी रहती हैं। इसमें लोहे के दो पहियों का व्यवहार होता है जिनमें से एक चालक (driver) का कार्य करता है दूसरा मंदक (idler) की तरह होता है। यह ट्रैक्टर भारी कार्य, जैसे बाँध के निर्माण और अन्य औद्योगिक कार्यों के लिये बड़े पैमाने पर व्यवहृत होता है। कृषि में इसका व्यवहार क

    उपयोगिता के अनुसार

    उपयोगिता के अनुसार कर्षित्र के निम्नलिखित पाँच भेद हैं:
    1. सामान्य कार्य कर्षित्र (General purpose tractor) - ये कर्षित्र मानक अभिकल्प के होते हैं, जैसे चार चक्रवाले या लीक प्रकार के कर्षित्र।
    2. सर्वकार्य कर्षित्र (All purpose tractor) - ऐसे कर्षित्र से प्राय: सभी तरह के कर्षित्र कार्य लिए जा सकते हैं।
    3. फलोद्यान कर्षित्र (Orchard tractor) - ये छोटे या मध्यम आकारवाले यंत्र हैं। इनकी बनावट ऐसी होती है कि इनसे फलोद्यान में सुचारु रूप से कार्य लिया जा सकत है। इस प्रकार के कर्षित्र बहुत कम ऊँचाई वाले होते हैं एवं इनमें बहुत कम प्रक्षेपी (projecting) पुर्जे होते हैं।
    4. औद्यागिक कर्षित्र (Industrial tractor) - इन प्रकार के यंत्र किसी भी आकार या प्रकार के हो सकते हैं। इनका व्यवहार कारखानों और हवाई पत्तन (airports) इत्यादि स्थानों में होता है। ये रबर के पहिए तथा उच्च चाल पारेषण (High speed transmission) उपकरणों से युक्त होते हैं।
    5. बाग-कर्षित्र (Garden tractor) - यह बगीचों या छोटे छोटे खेतों में व्यवहार किया जानेवाला सबसे छोटे आकार का ट्रैक्टर होता है। यह तीन आकार का बनाया जाता है: छोटा आकार, मध्यम आकार और बड़ा आकार। छोटे आकारवाले यंत्र से बगीचों में पौधा लगाने का एवं खेती का कार्य लिया जाता है। मध्यम और बड़े आकारवाले बाग कर्षित्र का व्यवहार हल चलाने आदि के कार्य के लिये लिया जाता है। इस यंत्र को चालक चलाता है ओर उत्तोलक (Lever) की सहायता से इसे नियंत्रित करता हैम है।

    ट्रैक्टर की बनावट

    सभी ट्रैक्टरों में निम्नलिखित तीन भाग होते हैं:
    1. इंजन और उसके साधन,
    2. शक्ति पारेषण प्रणाली (power transmitting system),
    3. चेजिस (chassis)

    Sunday, 3 May 2015

    कीटविज्ञान

    कीटविज्ञान (एंटोमॉलोजी Entomology) प्राणिविज्ञान का एक अंग है जिसके अंतर्गत कीटों अथवा षट्पादों का अध्ययन आता है। षट्पाद (षट्=छह, पाद=पैर) श्रेणी को ही कभी-कभी कीट की संज्ञा देते हैं। कीट की परिभाषा यह की जाती है कि यह वायुश्वसनीय संधिपाद प्राणी (Arthropod) है, जिसमें सिर, वक्ष और उदर स्पष्ट होते हैं; एक जोड़ी श्रृंगिकाएं (Antenna) तीन जोड़े, पैर और वयस्क अवस्था में प्राय: एक या दो जोड़े पंख होते हैं। कीटों में अग्रपाद कदाचित्‌ ही क्षीण होते हैं।


    परिचय

    कीट की उत्पत्ति बहुत प्राचीन है, क्योंकि वे कार्बनप्रद (Carbonniferous) युग में तो निश्चित रूप से ही वर्तमान थे और संभवत: इससे भी पूर्व रहे हों। 1930 ई0 तक 10,400 जीवाश्म (Fossil) कीटों का वर्णन किया जा चुका था और तब से अब तक अन्य अनेक कीट इस सूची में जोड़े जा चुके हैं। वर्तमान जातियों (Species) की संख्या लगभग 6,40,000 हैं। ऐसा अनुमान है कि यदि सभी का उल्लेख किया जाए तो उनकी संख्या 20,00,000 तक पहुँच जाएगी। कीट न्यूनाधिक सब क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
    अनेक सामाजिक कीटों का कुल बड़ा होता है। रानी मधुमक्खी में प्रति दिन 4,000 अंडे देने की क्षमता होती है और बसंत ऋ तु में एक छत्ते में 40,000 से 50,000 तक मक्खियाँ होती हैं। चीटियों की बड़ी बस्ती में 5,00,000 चींटियां पाई जाती हैं। एक टिड्डी दल में तो लाखों, करोड़ों की संख्या रहती है। एक प्रतिवेदन के अनुसार किसी टिड्डी दल के आक्रमण के समय 15,000 एकड़ भूमि में कीट फैल गए थे और इतने विस्तृत क्षेत्र की फसल सात या आठ घंटों में चट कर गए थे।
    मादा कीट प्राय: बड़ी संख्या में अंडे देती है और अंडे अद्भुत ढंग से सुरक्षित रहते हैं। अधिकांश कीटों का जीवनचक्र छोटा होता है। बहुसंख्यक कीट एक साल में वयस्क हो जाते हैं और कितनों की तो एक ऋ तु में ही अनेक पीढ़ियाँ तैयार हो जाती हैं। कुछ कीटों में अनिषेकजनन (Parthenogenesis) होता है। सेसिडोमिडी (Cecidomyidae) में अनिषेकजनन की एक अनूठी विधि है जिसे पीडोजेनेसिस (Paedogenesis) कहते हैं।
    साधारण कीट छोटे होते हैं, पर बड़े बड़े कीट भी पाए जाते हैं। सबसे बड़ा जीवित कीट इरिबस एग्रीपीना (Erebus agrippina) है। यह एक प्रकार का शलभ (Moth) है। यह ब्राज़ील में पाया जाता है। इसके पंख का फैलाव ग्यारह इंच होता है।
    कीट विज्ञान की कई शाखाएँ हैं, जिनमें आर्थिक (Economic) कीटविज्ञान प्रमुख शाखाओं में से एक है। इसके अंतर्गत लाभकर और हानिकारक कीटों का अध्ययन आता है। इसमें कीटों का नियंत्रण, उनकी संख्या में कमी करना, विरल क्षतिकर्ता जातियों का विलोपण, लाभदायक कीटों का विस्तार और सुंदर एवं निर्दोष कीटों का अधिमूल्यन (appreciation) सम्मिलित हैं। 6,40,000 कीट जातियों में से 10,000 जातियाँ ही क्षति पहुँचानेवाली हैं। कुछ कीड़े विनाशकारी हैं। इनका नियंत्रण परमावश्यक होते हुए भी प्राय: कठिन और खर्चीला होता हैं।
    आर्थिक कीटविज्ञान के कई भाग हैं, यथा : क विनाशकारी कीटों की पहचान, ख जातियों के स्वभाव का अध्ययन, जिससे उनके जीवनचक्र का कोई भेद या रहस्य ज्ञात हो सके; ग नियंत्रण विधि का निर्धारण एवं घ उपलब्ध ज्ञान के फल का उत्पादकों और कृषकों में प्रसार।
    बहुत से कीट मानव रोगों के प्राथमिक अथवा माध्यमिक पोषक (host) या वाहक का काम करते हैं। अनेक प्रकार के जीवाणुओं, जैसे प्रोटोज़ोआ (Protozoa), केंचुए (Nematodas) और विषाणुओं (Viruses) इत्यादि का प्रसार कीटों द्वारा होता है। मानव रोगों में शीतज्वर (मलेरिया) अधिक गंभीर कीटजनित बीमारी है। प्लेग के विषाणु बैसिलस पेस्टिस (Bacillus pestis) का प्रसार फुदककीट (फ्ली Flea), द्वारा ही मनुष्यों, चूहों तथा अन्य कुतरनेवाले प्राणियों में होता हैं। 1914 ई. में भारत में प्लेग से 1,98,875 लोगों की मृत्यु हुई थी।
    टाइफ़ाइड ज्वर बैक्टीरिया जनित बीमारी है। इसकी छूत कई प्रकार से लग सकती है। घरेलू मक्खी इस रोग का मुख्य प्रसारक समझी जाती है। अनेक प्रकार के फीताकृमि (Tapaworm) अपने जीवनेइतिहास का कुछ अंश कीटों के शरीर में व्यतीत करते हैं। अन्य अनेक रोगों का प्रसार भी कीटों द्वारा होता है।
    उष्ण प्रदेशों में निद्रालु रोग (Sleeping sickness) त्सेत्सि (Tsetse) मक्खी द्वारा और फीलपाँव (Elephantisis) मच्छरों द्वारा फैलता है।

    विषैले कीट

    बहुत सी श्रेणियों के कीट डंक मारते हैं या त्वचा में प्रदाह उत्पन्न करते हैं। मधुमक्खी का दंश प्राय: क्षणिक होता है और गंभीर नहीं होता। संभवत: बाल्डफेसेड हार्नेट (Baldfaced hornet) और येलो जैकेट (Yellow Jacket) बहुत ही डरावने होते हैं। चींटियाँ भी डंक मारती हैं और शिकार के शरीर में सीधे फॉरमिक अम्ल प्रविष्ट कर देती है। अग्नि चींटी (Solenopsis geminata) बहुत ही कलहप्रिय होती हैं और इसका अंश भयंकर जलन उत्पन्न करता है।
    खटमल विषैले होते हैं। कुछ मक्खियाँ अतीव अनिष्टकर होती हैं। मच्छरों का दंश तो भली भाँति मालूम है। अश्व मक्खी (हॉर्स फ्लाई) और अस्तबल मक्खियों (स्टेबल फ्लाई) का मुखांग बहुत ही तीक्ष्ण होता है। इनका दंश प्राय: तीव्र पीड़ा पहुँचाता है। भारत के पैंगोनिया लांगिरोस्ट्रिस (Pangonia longirostris) की सूँड़ इसके शरीर से तिगुनी या चौगुनी बड़ी होती है और काफी मोटे कपड़े से ढकी होने पर भी मनुष्य की त्वचा को भेद देती है।

    डंक मारनेवाले कीट (Netting insects)

    इनके शरीर पर विषैले लोम होते हैं। ये संख्या में बहुत हैं। डकधारी लोम बड़े खतरनाक होते हैं। जब वे आँख की पुतली में गड़ा दिए जाते हैं तब बड़ी जलन पैदा करते हैं।

    लाभकारी कीट (Beneficial insects)

    लाभकारी कीट पाँच भागों में बाँटे जा सकते हैं :
    क जिनसे लाभदायक पदार्थ उत्पन्न होते हैं ;
    ख. जो चिकित्सा के काम आते हैं ;
    ग. जो हानिकारक कीटों के प्राकृतिक नियंत्रण में प्रयुक्त होते हैं ;
    घ. जो फलों का परागण (Pollination) करते हैं और
    ड. जो कला के काम आते हैं।
    मधुमक्खियों से हम मधु तथा मोम प्राप्त करते हें। दूसरे अनेक कीट एक प्रकार का मोमी पदार्थ पैदा करते हैं, जिसे मनुष्य विभिन्न उपयोगों में लाते हैं। चाइना मोम एक प्रकार के शल्क कीट एरिसेरस पेलि (Ericerus pele) द्वारा स्रवित होता है। भारतीय लाख कीट लेसिफर, या टेकारडिया लक्का [Lacifer (Tachardia) lacca] एक प्रकार का रस स्रवित करता है, जिससे व्यावसायिक दृष्टि से उपयोगी कच्ची लाख का उत्पादन होता है। सैन होसे स्केल, (San Jos Scale) वूली ऐफिस (Woolly aphis) और अन्य कीट अच्छी मात्रा में मोम उत्पन्न करते हैं, किंतु इतनी अधिक मात्रा में नहीं कि उनका व्यावसायिक मूल्य हो। एक शल्क कीट, कोकस मैनिफेरा (Coccus manifera) खाद्योपयोगी शल्कली (फ्लेकी, Flaky) स्राव उत्पन्न करता है। कॉचिनील नामक रंजक कोकस कैक्टाइ (Coccus cacti) नामक शल्की कीट के सुखाए हुए शरीर की बुकनी से तैयार किया जाता है।
    कीटोत्पन्न पदार्थों में से रेशम सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। यह बहुसंख्यक सूंडियों (कैटरपिलर, Caterpillar) तथा अन्य अनेक प्रकार के कीटों एवं मकड़ियों के डिंभों (larva) द्वारा काता जाता है। बांबिक्स मोरी (Bombyx mori) के अतिरिक्त रेशम का अन्य कोई भी कीड़ा व्यावसायिक उपयोगिता का नहीं पाया गया है।
    कीट माजूफल (Insects gall) से टैनिन प्राप्त होता है, जो खाल को पकाने तथा स्थायी, पक्की स्याही बनाने में काम आता है।
    मैड ऐपल सदृश कीटजनित फलों से एक दूसरा उत्पाद टर्की रेड प्राप्त होता है।

    चिकित्सा के काम आने वाले कीट

    बहुत प्रकार के कीट औषधीय गुणों के लिए प्रख्यात हैं। ब्लिस्टर बीटल (Blister beetle) के शरीर से कैंथराइडिन (Cantharidin) निकाला जाता है। अन्य अनेक विभिन्न जातियों के कीटों से भी कैंथेराइडिन प्राप्त होता है, किंतु भारत की मिलाब्रिस सिकोरी (Mylabris cichorii) जाति अन्य सभी जातियों की अपेक्षा दुगुना उत्पादन करती है। एक विशेष औषधि ऐल्कोहल की सहायता से एपिस (Apis) नामक मक्खियों के शरीर से निष्कर्षित होती है। गलित ऊतकों एवं घावों में वर्तमान बैक्टीरियों को साफ करने के लिये बूल्फार्टिया (Wolfahrtia) के मैगॉट (Maggot) का उपयोग उदस्फोभृंग (Blister beetle) होता है। यह कोलिआप्टॅरा गण का कीट है।

    पराश्रयी एवं शिकारी प्रकृति के कीट (Parasitic and predaceous Insects)

    विगत कुछ वर्षों में प्रजनन विज्ञान और पराश्रयी एवं शिकारी कीटों की पहचान की ओर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। विनाशकारी कीटों के नियंत्रण के लिए परोपजीवी और शिकारी प्रकृति के कीट विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होते हैं। कीटों के 26 वर्गों में से 18 वर्ग शिकारी तथा पराश्रयी कीटों के हैं। हाइमेनाम्‌ॅटरा (Hymenoptera) तथा डिप्टरा (Diptera) वर्ग में सबसे अधिक पराश्रयी कीट हैं। हेमिप्टरा (Hemiptera) कोलिऑप्टरा (Coleoptera) न्यूरॉप्टरा (Neuroptera) तथा डिप्टरा वर्गों के अंतर्गत सबसे अधिक संख्या में शिकारी प्रकृति के कीट मिलते हैं।

    कीट परागण

    फलों के परागण में कीट बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुए हैं। बहुत से पुष्पों में तो पराग का स्थानांतरण सरल होता है, किंतु कुछ पुष्पों का विकास इस प्रकार होता है कि कीट आकर्षित होकर उनके पास जाएँ, अथवा कीट का विकास इस प्रकार होता है कि उसे पुष्पों से पराग लेने में सुभीता हो। स्मारना के अंजीर की वृद्धि के लिये ब्लास्टोफ़ागा (Blastophaga) कीट आवश्यक है।

    भोज्य कीट

    ये चिड़ियों, छिपकलियों, मेढकों, सर्पों, मछलियों एवं अन्य प्राणियों के भोजन के काम आते हैं। मनुष्य भी फल और सब्जी के साथ साधारणत: अनजाने अनेक कीटों का भक्षण कर जाता है। आदि जातियाँ बड़ी चाह और रुचि से कीटों का भक्षण करती है। अमेजन की घाटियों के निवासी सौबा (Sauba) और चींटी (अट्टा सेफालोटिस Attacephalotes) खाते हैं। दीमक उष्णप्रदेशीय कुछ जातियों का रुचिकर भोजन है। मेक्सिको में कोरिक्सा फेमोराटा (Corixa femorata) के अंडे सुस्वादु भोजन समझे जाते हैं। अफ्रीका में खाने के लिए गोलिक्थ भृंग (Goliath beetle) की विशेष पूछ होती है। पश्चिमी संयुक्त राज्य (अमरीका) में प्रिओनस कैलिफ़ोर्निकस (Prionus californicus) नामक कीट आकार में बड़ा होने के कारण प्रिय था। कीट कभी-कभी कच्चे भी खाए जाते हैं। किंतु अधिकतर इनसे विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं।

    गायक कीट

    अनेक कीट अपने पंखों को पैर से रगड़कर, झिल्लियों अथवा पंखों को कंपित कर, या किसी अन्य प्रकार से ध्वनि पैदा करते हैं। प्रश्न उठता है कि क्या इस प्रकार की ध्वनि को संगीत कहा जाए ? कीट विज्ञानवेत्ता इसे झंकार (सॉनिफ़िकेशन sonification), या स्ट्रिडयलेशन (stridulation) अथवा अव्यक्त उच्चारण (फ़ोनेशन phonation) कहते हैं। जापान में सिकाड़ा (Cicada) और झींगुर (Crickets) पिंजड़े में रखे जाते हैं और उनकी झंकार आनंदकर समझी जाती है।

    कला और कीट

    अलंकारों एवं चित्रों में मॉरफोस (Morphos) तितली के चमकीले नीले पंखों के टुकड़ों का व्यवहार होता है। ये रंग फीके नहीं पड़ते। अमरीका के रेड इंडियन अपनी हस्तकला में चिड़ियों के पंखों के स्थान पर कीड़ों के टुकड़े लगाते थे। इक्वेडर के जिवारो (Jivaros) व्यूप्रेस्टिड भृंग (Burprestid beetles) के हरे, चमकीले, पंख, एलिट्रा (Elytra) से कर्णफूल बनाते हैं। अनेक जातियाँ वस्त्रों पर कीटों से बने बेल बूटे अर्थात्‌ मोटिफ का भी उपयोग करती हैं। स्काराह (Scarah) मिस्र का बहुत लोकप्रिय कीट था और मिस्रियों के सूर्यदेव, खेपेरा (Khepera) का प्रतिरूप माना जाता था। ग्रीस में बहुत से सिक्कों पर मधुमक्खी का चित्र पाया जाता है। जापानी कला में प्राय: इनरॉस (inros), नटसुके (netsukes-बटन सदृश एक प्रकार का जापानी आभूषण), हाथीदाँत की नक्काशी, हरितमणि (यशब jade), पन्ना, लकड़ी इत्यादि पर कीटों का उपयोग बहुधा होता है। वस्तुत: कला की कदाचित्‌ ही कोई शाखा हो जिसमें किसी-न-किसी रूप में कीटा का प्रदर्शन न होता हो।

    रूपांतरण (मेटामार्फोसिस Metamorphosis)

    अधिकतर कीटों के अंडों से निकलनेवाले डिंभों की आकृति पूर्ण कीट से बहुत भिन्न होती है। डिंभ से प्यूपा और प्यूपा के वयस्क बनने की परिवर्तन श्रृंखला को रूपांतरण कहते हैं। केवल कुछ वर्गों और बहुत कम जातियों को छोड़कर रूपांतरण सभी कीटों के जीवन की एक प्रमुख विशेषता है। रूपांतरण के तीन आधारभूत सिद्धांत हैं: वृद्धि, भेदीकरण तथा प्रजनन। वृद्धि डिंभ और निंफ से, भेदीकरण प्यूपा अथवा रूपांतरण से, तथा प्रजनन वयस्क से संबंधित होते हैं।
    अंडे से लेकर वयस्क तक विकास क्रमिक है। 1. अंडा, 2-6. अर्भक (Nymphal) अवस्था, 7 वयस्क।
    कीट के जीवन में विकासकाल भी होता है, जो अन्य कालों से स्पष्ट तथा भिन्न होता है। इन्हें अवस्थाएँ कहते हैं। पूर्ण रूपांतरणवाले कीटों में अंडें की अवस्था, प्यूपावस्था और वयस्क अवस्था होती हैं। ये अवस्थाएं फिर इन्स्टारों (Instars) में बँटी हैं, जिनकी विशेषता मुखों में होती हैं। डिंभावस्था में प्रत्येक बार के निर्मोचन (Moult) अथवा नए रूप के बनने पर, उनकी आकृति में स्पष्ट परिवर्तन होता है। परिवर्तन प्राय: एक इन्स्टार (रूप) से प्रारंभ होकर बाद के इन्स्टार में पूरा होता है। एक रूप से दूसरे रूप के अंतराल में भी अंतर होता है। डिंभ प्रत्येक रूप के काल में भोजन आत्मसात्‌ करता है, किंतु प्रत्यक्ष वृद्धि पुरानी डिंभावस्था के निर्मोचन के बाद ही होती है। वयस्क अवस्था में रंगविकास होता है और कीट प्रौढ़ होता है। आकृति और रचना के परिवर्तन के साथ-साथ उसके भोजन और स्वभाव में भी परिवर्तन होता है। कीट के स्वभावपरिवर्तन और भोजनपरिवर्तन में घना संबंध है। लेपिडॉप्टरा (Lepidoetra) के अधिकतर डिंभ वनस्पतिभोजी होते हैं, किंतु वयस्क मकरंद (नेक्टर nectar) चूसते हैं या निराहार रहते हैं। शिशु हाइमेनॉप्टरा (Hymenoptera) विभिन्न प्रकार के भोजन पर पलते हैं। शिशु दीमक लकड़ी, मुँह से उगला हुआ या मलाशय से निकला हुआ पदार्थ, विसर्जित त्वचा और लार इत्यादि खाते हैं। निंफ पहले पहल लार, तब उदरीय भोजन और अंत में लकड़ी खाते हैं।

    वृद्धि

    वयस्क कीटों में आहार की वृद्धि कदाचित्‌ ही होती है और अंडों में बहुत ही कम। विकास के अर्थ में वृद्धि कीटजीवन की सभी अवस्थाओं में होती है। कीटों में अवयस्क अवस्था खाने और वृद्धि करने की होती है और उनके जीवन का अधिकांश भाग वृद्धि और विकास में बीतता है। सामान्यत: कीट की वृद्धि तेजी से होती है। अधिकांश जातियाँ एक साल में ही पूरे आकार की हो जाती हैं और बहुत सी कुछ ही सप्ताहों में।

    निर्मोचन (मोलिंटग Moulting)

    अन्य प्राणियों की भाँति कीट में वृद्धि क्रमिक एवं लगातार नहीं होती। डिंभ अथवा शिशु (निंफ Nymph) भोजन करता है और बढ़ता है। फलस्वरूप इसकी त्वचा क्युटिकुला (Cuticula) बहुत जोर से तन जाती है। इस बीच पुरानी त्वचा के नीचे एक नई त्वचा तैयार हो जाती है। नई और पुरानी त्वचा के बीच निर्मोचन द्रव (मोल्‌ंटग फ्लूइड moulting fluid) उत्पन्न होता है, जो पुरानी त्वचा को घुला देता है और उसे शरीर से अलग करने में सहायक होता है। यथोचित समय पर सिर के समीप पृष्ठभाग में त्वचा फट जाती है और कीट अपनी पुरानी त्वचा से रेंगकर बाहर चला आता है। त्वग्मोचन के पश्चात्‌ नई त्वचा शीघ्र ही कड़ी पड़ जाती है। रंग निखर जाता है और कीट दूसरी बार भोजन करने पर वृद्धि के लिए तैयार हो जाता है। इस क्रिया को त्वग्मोचन (Ecdysis) कहते हैं। पुरानी त्वचा को, जो अलग हो जाती है, निर्मोक (एग्ज्यूबिई Exuviae) कहते हैं। त्वग्मोचन के बीच के काल को स्टैडियम (Stadium) और इस अवस्था के कीट को इन्स्टार कहते हैं।
    त्वग्मोचन की क्रिया बहुत ही सूक्ष्म होती है और इस समय का कीट प्राय: निष्क्रिय, असहाय और किसी प्रकार की क्षति के प्रति तीव्र अनुभूतिशील होता है।

    कीटव्यवहार

    कीटव्यवहार की तीन श्रेणियाँ, (1) आवर्तना (Tropism), (2) सहजवृत्ति (Instinct) और (3) मेधा (Intelligence) हैं :

    आवर्तना (Tropism)

    कीटों पर वातावरण का लगातार प्रभाव पड़ता है। इसके प्रति वे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से संवेदनशील होते हैं। इन संवेदनाओं की अभिक्रिया को आवर्तना अथवा ट्रॉपोटैक्सेज़ (Tropotaxes), कहते हैं। आवर्तना कदाचित्‌ ही व्यक्तिश: होती है। किसी प्रकार के रसायन के प्रति कीटों की अभिक्रिया को रासायनिक आवर्तना (Chemotropism), स्पर्शसंवेदना के प्रति स्पर्शावर्तना (थिग्मॉट्रोपिज्म, Thigmotropism), जलधारक के प्रति स्रावावर्तना (रीऑट्रोपिज्म, Rheotropism), जल के प्रति जलावर्तना (हाइड्रॉट्रोपिज्म Hydotropism), विद्युद्धाराओं के प्रति अनिलावर्तना (ऐनिमॉट्रापिज्म, Anemotropism), गुरुत्वाकर्षण के प्रति भूम्यावर्तना (जिऑट्रापिज्म, Geotropism), प्रकाश के प्रति प्रकाशावर्तना (फोटॉट्रोपज्म), उष्णता के प्रति तापावर्तना (थरमॉट्रोपिज्म Thermotropism) कहलाती है।

    सहजवृति

    किसी जीव का एक या अनेक संवेदनाओं के प्रति संवेदनशील होना सहजवृत्ति कहलाता है। सहजवृत्तिवाली क्रियाओं के अंतर्गत नियामक परिवर्ती क्रियाएं (कोऑरडिनेटेड, रिफ्ल़ेक्सेज़ Coordinated reflexes) और आवर्तन की जटिल श्रृंखलाएं होती हैं। भारत के पियरिस ब्रैसिकी (Pieris brassiace) के स्वभाव की अपरिवर्तनीयता इसका एक उदाहरण है। मार्च में कुछ कीट (पियरिस ब्रैसिकी) हिमालय के पार्श्व में उड़ते पाए गए थे। अप्रैल के अंत में प्रति मिनट हजारों की संख्या में हिमाच्छादित शिखर की दिशा में, जहां वे निश्यच ही मृत्यु को प्राप्त हुए होंगे, ये उड़ रहे थे। कोई समझ नहीं पाता कि कौन सी शक्ति इन तितलियों को विनाश की ओर प्रेरित करती हैं। वस्तुत: उन्हें इस सर्वनाश का पूर्वाभास नहीं होता। उसी प्रकार देशांतरण करती हुई टिड्डियाँ किसी प्रकार के अवरोध की परवाह नहीं करतीं। निष्कर्ष यह है कि कीट अपने को असाधरण दशा के अनुकूल बनाने में अयोग्य होते हैं।

    मेधा (इंटेलिजेंस Intelligence)

    यद्यपि कीट कुछ कृत्यों अथवा छायाचित्रों को याद रखनेवाले प्रतीत होते हैं, किंतु वे स्वेच्छा से पुन: स्मरण करने में असमर्थ होते हैं। अतएव उनमें तर्क अथवा समझने की क्षमता नहीं होती।

    कीटसंघ तथा सामाजिक कीट

    कीटसंघ किसी एक विशेष जाति का या जातियों का हो सकता है। इस प्रकार का साथ निष्क्रिय अथवा सक्रिय और कीटजीवन के कुछ ही अंशों तक, अथवा पूरे जीवन भर, चल सकता है।
    (क) निष्क्रिय कीटसंघ-बहुधा तरंग, ज्वार भाटा अथवा हवा के प्रवाह के साथ कीट बड़ी संख्या में किसी स्थान पर इकट्ठा हो जाते हैं। इस प्रकार का जमाव प्राय: कुछ जातियों के कीटों के लिए विनाशकारी हो सकता है, किंतु दूसरे प्राणियों के लिए भोजन के रूप में लाभदायक होता है।
    (ख) सक्रिय साहचर्य-भोजन, मैथुन, निद्रा, दलीय उड़ान, स्थानांतरण, ग्रीष्मकालीन निष्क्रियता (एस्टिवेशन Estivation) अथवा शीतकालीन निष्क्रियता (हाइबर्नेशन Hibernation), छोटे अथवा बड़े दल में कीटों के एकत्र होने के कारण हो सकते हैं। जो कीट किसी संघ अथवा समाज में रहते हैं, पर वास्तव में सामाजिक नहीं है, यूथचर (ग्रिगेरियस gregarious), कहलाते हैं।
    (ग) ग्रीष्मनिष्क्रिय अथवा शीतनिष्क्रिय साहचर्य-बहुत से कारण, जैसे सुरक्षित स्थान का चुनाव, कीटों, जैसे इंद्रगोप (लेडी बर्ड बीटल, सिरेटोमेगिला मैकुलाटा Ceratomegilla maculata), को ग्रीष्मनिश्ष्क्रिय होने, प्यूपा बनने अथवा निष्क्रियता के लिये बाध्य करते हैं। विभिन्न समूहों में एकत्र होने (Congregation) के स्वभाव में भिन्नता होती है।
    (घ) रक्षात्मक समूहन (प्रोटेक्टिव ऐग्रिगेशन Protective aggregation)-अपने समूहगत स्वभाव के कारण कीट संभवत: परोजीवियों शिकारी शत्रुओं और प्रतिकूल ऋ तुओं से सुरक्षित रहते हैं। शीत निष्क्रिय कीटों, जैसे घूर्णभृंग (Whirligig beetle) पर यह बात विशेष रूप से लागू होती है।
    लेपिडॉप्टरा (Lepidoptera) गण की 1. तितली (Butterfly) और 2. शलभ: (Moth) डिप्टरा (Diptera) गण की 3. मक्खी (House fly) तथा 4. मच्छर (Mosquito) साइफ़ोनेप्टरा (Siphoneptera) गण का 5. पिस्सू (flea) हाइमेनॉप्टरा (Hymenoptera) गण की मधुमक्खी: 6. श्रमिक, 7. रानी तथा 8. पुंमधुप और इसी गण की 9. ततैया (Wasp) तथा 10. चींटी।
    (ड़) प्रवाजी समूहन (Migrating aggregation)-कीट बहुधा बहुत्‌ समूहों में देशांतर गमन करते हैं। प्रोसेशन मॉथ (Cnetho campa (Bombyx) processione) का, जो वंजु (Oak) वृक्ष पर निर्वाह करता है, रात्रिप्र्व्राजन तथा चारा एकत्रित करनेवाली एवं सैन्य दल बाँधकर चलनेवाली चीटियाँ इसके उत्तम उदाहरण हैं।
    (च) झुंड में उड़नेवाला समूह (स्वार्मिंग ऐग्रिगेशन Swarming aggregation)-दल या झुंड बनाकर कीटों के चलने को स्वार्म कहते हैं। वास्तविक झुंड बनाकर उड़ने की आदत मैथुन से संबंधित होती है। मधुमक्खी, चींटी और दीमक की उड़ान इसके सामान्य उदाहरण हैं।
    (छ) शयन समूह (स्लीपिंग ऐग्रिग्‌ेशन Sleeping aggregation)-बहुधा कीट अपनी सक्रियता बंद कर देते हैं और सोने लगते हैं। क्षीरपाद (मिल्क वीड Milk wed) तितलियाँ अपने वार्षिक स्थानांतरण के समय सोने के लिये एकत्रित होती हैं।
    (ज) पृथक्करण (डिस्सोसिएशन Dissociation)-कीटों की कुछ जातियाँ विभिन्न कारणों से पृथक्‌ होने के लिये बाध्य होती हैं। शिकारी कीट, पेंटाटॉमिडी (Pentatomidae) रेडुवाइडी (Reduviidae) तथा फाइमैटिडी (Phymatidae) की अपेक्षाकृत बहुत बड़ी संख्या अंडों से उत्पन्न होती हैं और जन्म के पश्चात्‌ शीघ्र ही भोजन की खोज में बिखर जाती हैं, क्योंकि एक ही स्थान पर भोजन का अभाव होता है
    (झ) सामाजिक समूहन-वे कीट जो संगठित समूहों अथवा ऐसे वासस्थानों में रहते हैं, जहाँ श्रम का विभाजन होता है और श्रमिक कीट शिशु कीटों कों भोजन प्रदान करते हैं, सामाजिक कीट कहलाते हैं। उनकी सामान्य तथा सार्वलौकिक विशेषताएँ ये हैं: अपेक्षाकृत बड़ी आबादी, सहयोग, श्रमविभाजन, साधारणतया: पाथेय का उत्तरोत्तर संग्रह, अपत्यस्नेह, चबाए भोजन का विनियम (ट्रॉफैलैक्सिस trophallaxis), किसी-किसी में दल बनाकर उड़ान करना और न्यूनाधिक परिष्कृत नीड़ का निर्माण। प्रत्यक्ष रूप से पूर्णत: रूपांतरण करनेवाले कीटों का, जैसे चींटियों, मधुमक्खियों गुंजमधुमक्खियों (बंबुल बीज Bumble bees) पत्रततैयों (पेपर वास्प Paper Wasps) आदि का स्वाभाव सामाजिक होता है। क्रमिक रूपांतरण करनेवाले कुछ कीटों में भी, जैसे आइसॉप्टरा (Isoptera) तथा डरमॉप्टरा (Dermoptera) में, सामाजिक आदतें होती हैं। एंबाइडाइना (Embiidiena) तथा स्कैराबीइडी (Scarabaeidae) अपने शिशुओं का ध्यान रखते हैं और प्रारंभिक अवस्था के ही सामाजिक या उपसामाजिक कहे जाते हैं।
    (ट) एकांतप्रिय कीट (सॉलिटरी इंसेक्ट्स Solitary Insects) -इनकी आदतें स्वतंत्र भोजन प्राप्त करनेवाले और सामाजिक जीवन व्यतीत करनेवाले कीटों के मध्य की होती हैं। यह स्वभाव मुख्यत: मधुमक्खियों और बर्रों में पाया जाता है, यद्यपि अन्य जातियाँ भी इससे वंचित नहीं हैं।
    (ठ) मृतोपजीवी अथवा भंगी कीट (साप्रॉफागस इंसेक्ट Saprophagous Insects)-अल्पपोषक तत्वोंवाले, अनुपयोगी पदार्थों का उपयोग करने में समर्थ, आहारनाल के अतिरिक्त, भंगीकीटों के स्वभाव में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होती। भंगीकीट मुख्यत: थाइसान्यूरा (Thysanura), कोलेंबाला (Collembola), ब्लैटिडी (Blattidae) तथा निम्न क्षेणी के कोलिऑप्टरा (Coleoptera) तथा डिप्टरा (Diptera) में पाए जाते हैं।
    (ड) शिकारी कीट (प्रेडाटर्स Predators)-ये दूसरे प्राणियों के ऊपर जीवननिर्वाह करते हैं। शिकारी कीटों की विशेषता है कि वे किसी पोषक पर अस्थायी रूप से स्थित रहते है क्योंकि वे एक के बाद दूसरे पोषक अपनाते हैं और कभी-कभी तो सेकड़ों का भक्षण कर डालते हैं। ऑर्थोप्टरा (Orthoptera) गण का मैंटिडी (Mantidae) परिवार, न्यूरॉप्टरा (Newroptera) के डिंभ ओडोनाटा (Odonata) के निमज्जक तथा प्लीकॉप्टरा (Plecoptera), बहुसंख्यक हेटिरॉप्टरा (Heteroptera) और हाइमेनॉप्टरा (Hymenoptera) शिकारी जातियों के अंतर्गत आते हैं।

    परोपजीवी (Parasites)

    वे जातियाँ हैं जो दूसरे प्राणियों से, बिना उन्हें मारे, अपना भोजन प्राप्त करती हैं और प्राय: केवल एक ही पोषक पर आक्रमण करती हैं। जूँ इस समूह का अच्छा उदाहरण है।

    अर्धपरोपजीवी (पैरासाइटाइड, Parasitoids)

    परोपजीवी और शिकारी दोनों के मध्य के स्वभाव कीट अर्धपरोपजीवी कहलाते हैं। पहले तो यह परोपजीवी रहता है और पोषक के मर्मस्थल को छोड़ता चलता है, बाद में यह शिकारी बन जाता है और पोषक का भक्षण कर जाता है। इस प्रकार के अर्धपरोपजीवी प्रचुर संख्या में डिप्टारा तथा हाइमेनॉप्टरा वर्ग में मिलते हैं।

    कीट तथा पौधों का संबंध

    पौधे तथा कीटों का संबंध पारस्परिक हो सकता हैं। इसमें पौधे या कीट में से लाभान्वित हो सकता है। कीटों में अधिकांश स्वतंत्र रूप से भोजन करनेवाले होते हैं। कुछ तो भूमि के अंदर निवास करनेवाले और अन्य जलीय होते हैं, किंतु सभी पोषक के बाह्य भाग का ही भोजन करते हैं और विचरण करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। जो कीट विस्तृत या कम विस्तृत क्षेत्रों से भोजन प्राप्त करते हैं वे खाद्यान्वेषक (Forager) या शिकारी हैं। सभी वर्ग के कीटों में भोजन करने की स्वतंत्र आदतें होती हैं। कुछ चूसक होते हैं और कुछ चबानेवाले। टिड्डे (Grasshoppers) जून बीट्ल (June beetles), कट वर्म (Cut worms) आर्मी वर्म (Army worms) ऐपुल्‌ टेंट (Apple tent), टी कैटरपिलर (Tea caterpillar), वेब वर्म (Web worms) और लीफ बीटल (Leaf beetles) खाद्यान्वेषी जीव हैं। वे बहुधा झुंड में मिलाकर कार्य करते हैं और प्रत्यक्ष क्षति पहुँचाते हैं। अन्य जातियाँ, जैसे पॉलिफीमस (Polyphemus) के डिंभ अधिकतर अकेले ही खाते हैं।

    पत्तों में सुरंग बनानेवाले कीट

    इस जाति के डिंभ (लार्वा) अस्थायी रूप से अथवा जीवनपर्यंत पत्तों के बाह्य त्वचीय दो स्तरों के बीच निवास करते और पोषित होते हैं। कोलिऑप्टरा (Coleoptera) लेपिडॉप्टरा (Lepidopdera), डिप्टरा तथा हाइमेनॉप्टरा गण के कीटों में पत्तों में सुरंग बनाने की आदत है।
    पत्तों को लपेटनेवाले कीड़े-कीट के ऐसे डिंभों द्वारा पत्ते कुडंलाकार बनाए जाते हैं। ये डिंभ रेशम कातते हैं, जो पत्ते को मोड़ने अथवा लपेटने के लिये प्रयुक्त होता है। यह आदत अधिकांश लेपीडॉक्टरा वर्ग में पाई जाती है।

    द्रुस्फोट (Gall) कीट

    पौधे में द्रुस्फोट के मुख्य वाहक कीट और किलनियाँ है। कोलिऑप्टरा, लेपिडॉप्टरा, होमॉप्टरा, थाइसेनॉप्टरा, डिप्टरा और लेपिडॉप्टरा गणों के कीटो में यह आदत होती है।

    बेधक (Boring) कीट

    पौधे, प्राणी तथा भूमि आदि अनेक पदार्थों में कीट छेद करते है। पूर्ण रूपांतरित तथा हन्विकायुक्त मुखांग वाले कीटों में मुख्यत: छेद करने की आदत होती है। कालिऑप्टरा, लेपिडॉप्टरा, डिप्टरा और हाइरेनॉप्टरा वर्गों के अतंर्गत बेधक कीट पाए जाते हैं।

    आंतर्भौम (Subterranean) कीट

    ये अपना आंशिक या पूर्ण जीवन भूमि में मिट्टी के नीचे व्यतीत करते हैं। जापानी भृंग (Japanese Bettle) अपने जीवन के ग्यारह महीने अंडे, डिंभ और प्यूपावस्था में भूमि के नीचे व्यतीत करते हैं और भोजन तथा मैथुन के निमित्त कुछ समय के लिए बाहर निकलते हैं; तदुपरांत अंडे देने के लिए पुन: भूमि के नीचे चले जाते हैं। दूसरी ओर लेपिडॉप्टरा (Lepidoptera) प्यूपावस्था में कुछ ही समय के लिए भूमि में प्रवेश करते हैं। पृथ्वी के भीतर रहनेवाले अधिकांश कीट अपने जीवनेतिहास का कुछ अंश अंडे, डिंभ, निंफ, प्यूपा, अथवा वयस्क के रूप में जमीन के भीतर व्यतीत करते हैं। भूमि के नीचे एक या अनेक अवस्थाएँ व्यतीत करते हैं। अधिकांश वर्गों में जमीन के भीतर रहने की आदत होती हैं।

    जलीय (Aquatic) कीट

    वे जातियाँ हैं जो अधिक या कम जल से संबंधित होती हैं। हेलोबेटिस (Halobates) जीनस के वाटर स्ट्राइडर, जेराइडी (Gerridae), यथार्थ में छिछले जलीय हैं। प्राय: जलीय कीटसमूहों में उष्ण स्त्रोतवासी कीट पाए जाते हैं।

    खोल निर्माता (Case-making) कीट

    कीट की आंरभिक जीवनावस्था अर्थात्‌ अंडे, डिंभ तथा प्यूपा की अवस्था, प्राय: खोल में बंद होती हैं। थाइसान्यूरा कोलेंबोला (Thysanura Collembola) तथा ऑर्थोप्टरा (Orthoptera) के अतिरिक्ति लगभग सभी वर्गों के कीटों में, खोल बनाने की आदत होती हैं।

    सक्रियता का स्थगन

    विश्राम के प्राय: दो रूप होते हैं : शारीरिक विकास का रुकना, जिसे डायापॉज (Diapause) कहते हैं और सक्रियता का रूकना, जिसे किनेटोपॉज (Kinetopause) कहते हैं। कीटजीवन की किसी भी अवस्था में शारीरिक विकास रुक सकता हैं, किंतु संभवत: अंडे और प्यूपा अवस्था में यह रुकना बिलकुल स्पष्ट होता हैं। किनेटोपॉज कई प्रकार से हो सकता है, जैसे विश्राम, निद्रा, मूर्छा, ग्रीष्मकालीन निष्क्रियता, शीतकालीन निष्क्रियता और मृत्यु।