Tuesday, 8 September 2015

पॉलीघर



पॉलीघर या पॉलीहाउस (Polyhouse) पॉलीथीन से बना एक रक्षात्मक छायाप्रद घर है जिसका उपयोग उच्च मूल्य वाले कृषि उत्पादों को उत्पन्न करने के लिये किया जाता है। यह अर्धवृत्ताकार, वर्गाकार या लम्बे आकार का हो सकता है। इसमें लगे उपकरणों की सहायता से इसके अन्दर का ताप, आर्द्रता, प्रकाश आदि को नियन्त्रित किया जाता है।

पॉली हाउस तकनीक का उपयोग संरक्षित खेती के तहत किया जा रहा है। इस तकनीक से जलवायु को नियंत्रित कर दूसरे मौसम में भी खेती की जा सकती है। ड्रिप पद्धति से सिंचाई कर तापमान व आद्र्रता को नियंत्रित किया जाता है। इससे कृत्रिम खेती की जा सकती है, इस तरह जब चाहें तब मनपसंद फसल पैदा कर सकते हैं।

Monday, 7 September 2015

स्वास्थ्य का आधुनिक परिभाषा

स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों की अनुपस्थिति का नाम नहीं है। हमें सर्वांगीण स्वास्थ्य के बारे में अवश्य जानकारी होनी चाहिए। स्वास्थ्य का अर्थ विभिन्न लोगों के लिए अलग-अलग होता है। लेकिन अगर हम एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण की बात करें तो अपने आपको स्वस्थ कहने का यह अर्थ होता है कि हम अपने जीवन में आनेवाली सभी सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियों का प्रबंधन करने में सफल तापूर्वक सक्षम हो, वैसे तो अपने आपको स्वस्थ रखने के ढेर सारे आधुनिक तकनीक मौजूद है लेकिन ये सारे उतने अधिक कारगर नहीं है।

समग्र स्वास्थ्य की परिभाषा

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, स्वास्थ्य सिर्फ रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति ही नहीं बल्कि एक पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक खुशहाली की स्थिति है। स्वस्थ लोग रोजमर्रा की गतिविधियों से निपटने के लिए और किसी भी परिवेश के मुताबिक अपना अनुकूलन करने में सक्षम होते हैं। रोग की अनुपस्थिति एक वांछनीय स्थिति है लेकिन यह स्वास्थ्य को पूर्णतया परिभाषित नहीं करता है। यह स्वास्थ्य के लिए एक कसौटी नहीं है और इसे अकेले स्वास्थ्य निर्माण के लिए पर्याप्त भी नहीं माना जा सकता है। लेकिन स्वस्थ होने का वास्तविक अर्थ अपने आप पर ध्यान केंद्रित करते हुए जीवन जीने के स्वस्थ तरीकों को अपनाया जाना है।
यदि हम एक अभिन्न व्यक्तित्व की इच्छा रखते हैं तो हमें हर हमेशा खुश रहना चाहिए और मन में इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि स्वास्थ्य के आयाम अलग अलग टुकड़ों की तरह है। अतः अगर हम अपने जीवन को कोई अर्थ प्रदान करना चाहते है तो हमें स्वास्थ्य के इन विभिन्न आयामों को एक साथ फिट करना पड़ेगा। वास्तव में, अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना समग्र स्वास्थ्य का नाम है जिसमें शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वा स्थ्य, बौद्धिक स्वास्थ्य, आध्यात्मिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्वास्थ्य भी शामिल है।

शारीरिक स्वास्थ्य

शारीरिक स्वास्थ्य शरीर की स्थिति को दर्शाता है जिसमें इसकी संरचना, विकास, कार्यप्रणाली और रखरखाव शामिल होता है। यह एक व्यक्ति का सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक सामान्य स्थिति है। यह एक जीव के कार्यात्मक और/या चयापचय क्षमता का एक स्तर भी है। अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के निम्नलिखित कुछ तरीके हैं-
  • (1) संतुलित आहार की आदतें, मीठी श्वास व गहरी नींद
  • (2) बड़ी आंत की नियमित गतिविधि व संतुलित शारीरिक गतिविधियां
  • (3) नाड़ी स्पंदन, रक्तदाब, शरीर का भार व व्यायाम सहनश् ालता आदि सब कुछ व्यक्ति के आकार, आयु व लिंग के लिए सामान्य मानकों के अनुसार होना चाहिए।
  • (4) शरीर के सभी अंग सामान्य आकार के हों तथा उचित रूप से कार्य कर रहे हों।

मानसिक स्वास्थ्य

मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ हमारे भावनात्मक और आध्यात्मिक लचीलेपन से है जो हमें अपने जीवन में दर्द, निराशा और उदासी की स्थितियों में जीवित रहने के लिए सक्षम बनाती है। मानसिक स्वास्थ्य हमारी भावनाओं को व्यक्त करने और जीवन की ढ़ेर सारी माँगों के प्रति अनुकूलन की क्षमता है। इसे अच्छा बनाए रखने के निम्नलिखित कुछ तरीके हैं-
  • (1) प्रसन्नता, शांति व व्यवहार में प्रफुल्लता
  • (2) आत्म-संतुष्टि (आत्म-भर्त्सना या आत्म-दया की स्थिति न हो।)
  • (3) भीतर ही भीतर कोई भावात्मक संघर्ष न हो (सदैव स्वयं से युद्धरत होने का भाव न हो।)
  • (4) मन की संतुलित अवस्था।

बौद्धिक स्वास्थ्य

यह किसी के भी जीवन को बढ़ाने के लिए कौशल और ज्ञान को विकसित करने के लिए संज्ञानात्मक क्षमता है। हमारी बौद्धिक क्षमता हमारी रचनात्मकता को प्रोत्साहित और हमारे निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करने में मदद करता है।
  • (1) समायोजन करने वाली बुद्धि, आलोचना को स्वीकार कर सके व आसानी से व्यथित न हो।
  • (2) दूसरों की भावात्मक आवश्यकताओं की समझ, सभी प्रकार के व्यवहारों में शिष्ट रहना व दूसरों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना, नए विचारों के लिए खुलापन, उच्च भावात्मक बुद्धि।
  • (3) आत्म-संयम, भय, क्रोध, मोह, जलन, अपराधबोध या चिंता के वश में न हो। लोभ के वश में न हो तथा समस्याओं का सामना करने व उनका बौद्धिक समाधान तलाशने में निपुण हो।

आध्यात्मिक स्वास्थ्य

हमारा अच्छा स्वास्थ्य आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ हुए बिना अधूरा है। जीवन के अर्थ और उद्देश्य की तलाश करना हमें आध्यात्मिक बनाता है। आध्यात्मिक स्वास्थ्य हमारे निजी मान्यताओं और मूल्यों को दर्शाता है। अच्छे आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने का कोई निर्धारित तरीका नहीं है। यह हमारे अस्तित्व की समझ के बारे में अपने अंदर गहराई से देखने का एक तरीका है।
  • (1) समुचित ज्ञान की प्राप्ति तथा स्वयं को एक आत्मा के रूप में जानने का निरंतर बोध। सुप्रीम डॉक्टर के निरंतर संपर्क में रहना। स्वयं को जानने व अनुभव करने वाली आत्मा सदैव शांत व पवित्र होगी।
  • (2) अपने शरीर सहित इस भौतिक जगत की किसी भी वस्तु से मोह न रखना। दूसरी आत्माओं के प्रभाव में आए बिना उनसे भाईचारे का नाता रखना। इस प्रकार एक व्यक्ति के कर्म उन्नत होंगे तथा उच्चस्तरीय व विशिष्ट हो पाएंगे।
  • (3) सुप्रीम डॉक्टर या सर्वोच्च आत्मा से निरंतर बौद्धिक संप्रेषण ताकि सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त कर विशुद्ध कर्म की ओर प्रेषित की जा सके। आत्मा स्वयं को तथा दूसरों को विनीत, अनश्वर तथा दुर्गुणरहित पाएगी। उसे कोई भी सांसारिक बाधा त्रस्त नहीं कर सकती।

सामाजिक स्वास्थ्य

चूँकि हम सामाजिक जीव हैं अतः संतोषजनक रिश्ते का निमार्ण करना और उसे बनाए रखना हमें स्वाभाविक रूप से आता है। सामाजिक रूप से सबके द्वारा स्वीकार किया जाना हमारे भावनात्मक खुशहाली के लिए अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
  • (1) ऐसी मित्रता करें जो संतोषप्रद व दीर्घकालिक हो।
  • (2) परिवार व समाज से जुड़े संबंधों को हार्दिक व अक्षुण्ण बनाए रखें
  • (3) अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार समाज के कल्याण के लिए कार्य करना।
अधिकांश लोग अच्छे स्वास्थ्य के महत्त्व को नहीं समझते हैं और अगर समझते भी हैं तो वे अभी तक इसकी उपेक्षा कर रहे हैं। हम जब भी स्वास्थ्य की बात करते हैं तो हमारा ध्यान शारीरिक स्वास्थ्य तक ही सीमित रहता है। हम बाकी आयामों के बारे में नहीं सोचते हैं। अच्छे स्वास्थ्य की आवश्यकता हम सबको है। यह किसी एक विशेष धर्म, जाति, संप्रदाय या लिंग तक सीमित नहीं है। अतः हमें इस आवश्यक वस्तु के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। अधिकांश रोगों का मूल हमारे मन में होता है। एक व्यक्ति को स्वस्थ तब कहा जाता है जब उसका शरीर स्वस्थ और मन साफ और शांत हो। कुछ लोगों के पास भौतिक साधनों की कमी नहीं होती है फिर भी वे दुःखी या मनोवैज्ञानिक स्तर पर उत्तेजित हो सकते।

आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य की परिभाषा

आयुर्वेद मे स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा इस प्रकार बताई है-
समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियाः ।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थः इत्यभिधीयते ॥
( जिस व्यक्ति के दोष (वात, कफ और पित्त) समान हों, अग्नि सम हो, सात धातुयें भी सम हों, तथा मल भी सम हो, शरीर की सभी क्रियायें समान क्रिया करें, इसके अलावा मन, सभी इंद्रियाँ तथा आत्मा प्रसन्न हो, वह मनुस्य स्वस्थ कहलाता है )। यहाँ 'सम' का अर्थ 'संतुलित' ( न बहुत अधिक न बहुत कम) है।
स्वास्थ्य की आयुर्वेद सम्मत अवधारणा बहुत व्यापक है। आयुर्वेद में स्वास्थ्य की अवस्था को प्रकृति (प्रकृति अथवा मानवीय गठन में प्राकृतिक सामंजस्य) और अस्वास्थ्य या रोग की अवस्था को विकृति (प्राकृतिक सामंजस्य से बिगाड़) कहा जाता है। चिकित्सक का कार्य रोगात्मक चक्र में हस्तक्षेप करके प्राकृतिक सन्तुलन को कायम करना और उचित आहार और औषधि की सहायता से स्वास्थ्य प्रक्रिया को दुबारा शुरू करना है। औषधि का कार्य खोए हुए सन्तुलन को फिर से प्राप्त करने के लिए प्रकृति की सहायता करना है। आयुर्वेदिक मनीषियों के अनुसार उपचार स्वयं प्रकृति से प्रभावित होता है, चिकित्सक और औषधि इस प्रक्रिया में सहायता-भर करते हैं।
स्वास्थ्य के नियम आधारभूत ब्रह्मांडीय एकता पर निर्भर है। ब्रह्मांड एक सक्रिय इकाई है, जहाँ प्रत्येक वस्तु निरन्तर परिवर्तित होती रहती है; कुछ भी अकारण और अकस्मात् नहीं होता और प्रत्येक कार्य का प्रयोजन और उद्देश्य हुआ करता है। स्वास्थ्य को व्यक्ति के स्व और उसके परिवेश से तालमेल के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। विकृति या रोग होने का कारण व्यक्ति के स्व का ब्रह्मांड के नियमों से ताल-मेल न होना है।
आयुर्वेद का कर्तव्य है, देह का प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखना और शेष विश्व से उसका ताल-मेल बनाना। रोग की अवस्था में, इसका कर्तव्य उपतन्त्रों के विकास को रोकने के लिए शीघ्र हस्तक्षेप करना और देह के सन्तुलन को पुन: संचित करना है। प्रारम्भिक अवस्था में रोग सम्बन्धी तत्त्व अस्थायी होते हैं और साधारण अभ्यास से प्राकृतिक सन्तुलन को फिर से कायम किया जा सकता है।
यह सम्भव है कि आप स्वयं को स्वस्थ समझते हों, क्योंकि आपका शारीरिक रचनातन्त्र ठीक ढंग से कार्य करता है, फिर भी आप विकृति की अवस्था में हो सकते हैं अगर आप असन्तुष्ट हों, शीघ्र क्रोधित हो जाते हों, चिड़चिड़ापन या बेचैनी महसूस करते हों, गहरी नींद न ले पाते हों, आसानी से फारिग न हो पाते हों, उबासियाँ बहुत आती हों, या लगातार हिचकियाँ आती हो, इत्यादि।
स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में पंच महाभूत, आयु, बल एवं प्रकृति के अनुसार योग्य मात्रा में रहते हैं। इससे पाचन क्रिया ठीक प्रकार से कार्य करती है। आहार का पाचन होता है और रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सातों धातुओं का निर्माण ठीक प्रकार से होता है। इससे मल, मूत्र और स्वेद का निर्हरण भी ठीक प्रकार से होता है।
स्वास्थ्य की रक्षा
  1. करने के उपाय बताते हुए आयुर्वेद कहता है-
  2. त्रय उपस्तम्भा: आहार: स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति (चरक संहिता सूत्र. 11/35)

    अर्थात् शरीर और स्वास्थ्य को स्थिर, सुदृढ़ और उत्तम बनाये रखने के लिए आहार, स्वप्न (निद्रा) और ब्रह्मचर्य - ये तीन उपस्तम्भ हैं। ‘उप’ यानी सहायक और ‘स्तम्भ’ यानी खम्भा। इन तीनों उप स्तम्भों का यथा विधि सेवन करने से ही शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा होती है।


    स्वास्थ्य का आधुनिक दृष्टिकोण       

स्वास्थ्य की देखभाल का आधुनिक दृष्टिकोण आयुर्वेद के समग्र दृष्टिकोण के विपरीत है; अलग-अलग नियमों पर आधारित है और पूरी तरह से विभाजित है। इसमें मानव-शरीर की तुलना एक ऐसी मशीन के रूप में की गई है जिसके अलग-अलग भागों का विश्लेषण किया जा सकता है। रोग को शरीर रूपी मशीन के किसी पुरजे में खराबी के तौर पर देखा जाता है। देह की विभिन्न प्रक्रियाओं को जैविकीय और आणविक स्तरों पर समझा जाता है और उपचार के लिए, देह और मानस को दो अलग-अलग सत्ता के रूप में देखा जाता है।

Saturday, 5 September 2015

उर्वरक का वर्गीकरण

उर्वरक (Fertilizers) कृषि में उपज बढ़ाने के लिए प्रयुक्त रसायन हैं जो पेड-पौधों की वृद्धि में सहायता के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। पानी में शीघ्र घुलने वाले ये रसायन मिट्टी में या पत्तियों पर छिड़काव करके प्रयुक्त किये जाते हैं। पौधे मिट्टी से जड़ों द्वारा एवं ऊपरी छिड़काव करने पर पत्तियों द्वारा उर्वरकों को अवशोषित कर लेते हैं। उर्वरक, पौधों के लिये आवश्यक तत्वों की तत्काल पूर्ति के साधन हैं लेकिन इनके प्रयोग के कुछ दुष्परिणाम भी हैं। ये लंबे समय तक मिट्टी में बने नहीं रहते हैं। सिंचाई के बाद जल के साथ ये रसायन जमीन के नीचे भौम जलस्तर तक पहुँचकर उसे दूषित करते हैं। मिट्टी में उपस्थित जीवाणुओं और सुक्ष्मजीवों के लिए भी ये घातक साबित होते हैं। इसलिए उर्वरक के विकल्प के रूप में जैविक खाद का प्रयोग तेजी से लोकप्रीय हो रहा है। भारत में रासायनिक खाद का सर्वाधिक प्रयोग पंजाब में होता है।

उर्वरक का वर्गीकरण  ;

  • कार्बनिक/जैविक उर्वरक (कम्पोस्ट, यूरिया) या अकार्बनिक उर्वरक (अमोनियम नाइट्रेट)
  • प्राकृतिक (पीट) या कृत्रिम उर्वरक (सुपर फॉस्फेट)

पौधों के लिये आवश्यक पोषक तत्व ;

पौधों के लिये तीन प्रमुख पोषक तत्व हैं

  • नाइट्रोजन या नत्रजन
  • फॉस्फोरस
  • पोटैशियम या पोटाश

द्वितीयक पोषक तत्व ;

  • कैल्शियम
  • गंधक या सल्फर
  • मैग्नीशियम

सूक्ष्म पोषक तत्व (माइक्रोन्युट्रिएन्ट्स) ;

    • क्लोरीन
    • मैगनीज
    • लोहा
    • जस्ता (जिंक)
    • ताँबा (कॉपर)
    • मॉलीब्लेडनम्
    • सेलेनियम (केवल कुछ देशों में)

    सीमाएं ;

    उर्वरक, पौधों के लिये आवश्यक तत्वों की तत्काल पूर्ति के साधन हैं लेकिन इनके प्रयोग के कुछ दुष्परिणाम भी हैं। ये लंबे समय तक मिट्टी में बने नहीं रहते हैं। सिंचाई के बाद जल के साथ ये रसायन जमीन के नीचे भौम जलस्तर तक पहुँचकर उसे दूषित करते हैं। मिट्टी में उपस्थित जीवाणुओं और सुक्ष्मजीवों के लिए भी ये घातक साबित होते हैं। भारत में रासायनिक खाद का सर्वाधिक प्रयोग पंजाब में होता है। वर्तमान समय में वहाँ पानी का जलस्तर एवं मृदा की पोषकता में भारी कमी देखी गई है। इसके साथ ही मृदा तथा उपज में हानीकारक रसायनों की मात्रा में बहुत वृद्दी पाई गई है। इसलिए उर्वरक के विकल्प के रूप में जैविक खाद का प्रयोग तेजी से लोकप्रीय हो रहा है।

    प्रमुख रासायनिक उर्वरक ;

    यूरिया ;

    पहचान विधि :


    • सफेद चमकदार, लगभग समान आकार के गोल दाने।
    • पानी में पूर्णतया घुल जाना तथा घोल छूने पर शीतल अनुभूति।
    • गर्म तवे पर रखने से पिघल जाता है और आंच तेज करने पर कोई अवशेष नही बचता।

    डाई अमोनियम फास्फेट (डी.ए.पी.)  ; 

    पहचान विधि   
    • सख्त, दानेदार, भूरा, काला, बादामी रंग नाखूनों से आसानी से नहीं छूटता।
    • डी.ए.पी. के कुछ दानों को लेकर तम्बाकू की तरह उसमें चूना मिलाकर मलने पर तीक्ष्ण गन्ध निकलती है, जिसे सूंघना असह्य हो जाता है।
    • तवे पर धीमी आंच में गर्म करने पर दाने फूल जाते है।

    सुपर फास्फेट ;

    पहचान विधि :
    • यह सख्त दानेदार, भूरा काला बादामी रंगों से युक्त तथा नाखूनों से आसानी से न टूटने वाला उर्वरक है। यह चूर्ण के रूप में भी उपलब्ध होता है। इस दानेदार उर्वरक की मिलावट बहुधा डी.ए.पी. व एन.पी.के. मिक्चर उर्वरकों के साथ की जाने की सम्भावना बनी रहती है।

    जिंक सल्फेट ;

    पहचान विधि :
    • जिंक सल्फेट में मैंग्नीशिम सल्फेट प्रमुख मिलावटी रसायन है। भौतिक रूप से समानता के कारण नकली असली की पहचान कठिन होती है।
    • डी.ए.पी. के घोल में जिंक सल्फेट के घोल को मिलाने पर थक्केदार घना अवक्षेप बन जाता है। मैग्नीशियम सल्फेट के साथ ऐसा नहीं होता।
    • जिंक सल्फेट के घोल में पतला कास्टिक का घोल मिलाने पर सफेद, मटमैला मांड़ जैसा अवक्षेप बनता है, जिसमें गाढ़ा कास्टिक का घोल मिलाने पर अवक्षेप पूर्णतया घुल जाता है। यदि जिंक सल्फेट की जगह पर मैंग्नीशिम सल्फेट है तो अवक्षेप नहीं घुलेगा।

    पोटाश खाद ;

    पहचान विधि :
    • सफेद कणाकार, पिसे नमक तथा लाल मिर्च जैसा मिश्रण।
    • ये कण नम करने पर आपस में चिपकते नहीं।
    • पानी में घोलने पर खाद का लाल भाग पानी में ऊपर तैरता है।

    उत्पादन ;

    विश्व के उर्वरक उत्पादक देश





    खाद डालने की मुख्य विधियाँ ; 

    • (१) तौलिए या थाला में डालना : तौलिए में छोटे पौधों में आधा व बड़े पौधों में एक फुट की तने से दूरी रखते हुये खादें डाल दी जाती है। खादें पौधों की टहनियों के फैलाव के नीचे बिखेर कर डालने के बाद मिट्टी में मिला दी जातीहै। मिट्टी में खादें मिलाना अति आवश्यक होता है। जब बहुत ज्यादा नमी हो या बहुत ज्यादा सूखा पड़ रहा हो तो खादें न डालें।
    • (२) पट्टी में खाद डालना : टहनियों के फैलाव के बाहरी घेरे में 20-25 सेंटीमीटर पट्टी में खादें डाल दी जाती है और ऊपर से ढक दिया जाता है। ऐसे विधि वहीं प्रयोग में लाई जाती है जहां ज्यादा बरसात होती है।
    • (३) छिड़काव विधि : पत्तों के ऊपर छिड़काव किया जाता है। ज्यादात्तर यूरियाखाद को पानी में घोल कर उसे छिड़काव द्वारा पत्तों पर डाला जाता है।
    • (४) बिखेर कर डालना : पौधों की दो पंक्तियों के बीच में पौधों से उचितदूरी बनाते हुये खेत में बिखेर कर खादें डाल दी जाती हैं। हिमाचल प्रदेश में इस विधि को कम ही प्रयोग किया जाता है और उन सेब के बागीचों में प्रयोग किया जाता है जहां तौलिए के बदले पूरा खेत ही साफ रखा हो।

    फरीदाबाद-नई दिल्ली मेट्रो का आज उद्घाटन करेंगे पीएम मोदी

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज औद्योगिक नगरी को मेट्रो रेल का तोहफा देंगे। मेट्रो का उद्घाटन करने के बाद वह सेक्टर-12 में रैली को भी संबोधित करेंगे। इस सेवा के चालू होने से फरीदाबाद से आइटीओ 60 मिनट में पहुंचा जा सकेगा। इस दौरान वह फरीदाबाद को गुड़गांव से मेट्रो से जोड़ने की घोषणा कर सकते हैं।
    आइटीओ से फरीदबाद का सफर इसी महीने
    इसके अलावा प्रधानमंत्री बिहार चुनाव के मद्देनजर फरीदाबाद सहित दिल्ली एनसीआर में रह रहे बिहारियों के लिए कई घोषणाएं कर सकते हैं। इनमें फरीदाबाद से पटना तक सीधे रेल गाड़ी चलाने सहित पूर्वांचलियों के लिए फरीदाबाद में एक कम्यूनिटी सेंटर बनाने की घोषणा को मुख्यमंत्री मनोहर ने सार्वजनिक कर दिया।

    अब सितंबर के पहले सप्ताह में होगा मेट्रो का शुभारंभ
    राज्य विधानसभा चुनाव के दौरान 6 अक्टूबर 2014 को फरीदाबाद की चुनावी सभा में मोदी ने घोषणा की थी कि भाजपा शासन में फरीदाबाद को उसका खोया औद्योगिक स्वरूप वापस लौटाया जाएगा।
    इस क्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री एवं स्थानीय सांसद कृष्णपाल गुर्जर का मानना है कि फरीदाबाद को देश के पहले सौ स्मार्ट शहरों में शामिल किया गया है। गुर्जर ने शनिवार शाम दावा किया कि प्रधानमंत्री की रैली ऐतिहासिक होगी और मोदी फरीदाबाद के विकास के लिए अलग से पैकेज देंगे।
    10 खास बातें
    1. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुबह 10.30 बजे फरीदाबाद मेट्रो को हरी झंडी दिखाएंगे
    2. मेट्रो कॉरिडोर लगभग 13.5 किमी लंबा है।
    3. इस कॉरिडोर के बीच 9 मेट्रो स्टेशन पड़ेंगे।
    4. कॉरिडोर से रोज करीब दो लाख लोगों को फायदा मिलेगा।
    5. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुजेसर मेट्रो स्टेशन पर एक प्रदर्शनी देखेंगे
    6. मोदी मुजेसर मेट्रो स्टेशन से बाटा चौक तक मेट्रो में सफर करेंगे।
    7. प्रधानमंत्री कार से एस्कॉर्ट्स मुजेसर मेट्रो स्टेशन पहुंचेंगे जहां वह बटन दबाकर मेट्रो बदरपुर-मुजेसर मेट्रो रेल लाइन विस्तार का उद्घाटन करेंगे।
    8. लोगों के लिए मेट्रो रुट शाम 4 बजे खुलेगा।
    9. मोदी सेक्टर-12 मैदान पर एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे।
    10.  समारोह के दौरान केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू, केंद्रीय मंत्री बीरेंदर सिंह, बाबुल सुप्रियो, कृषणपाल गुर्जर, हरियाणा के राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी, मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के अलावा हरियाणा के तमाम मंत्री मौजूद रहेंगे।

    Compensate users for call drops: TRAI to telco


     

    TRAI has come out with the paper more than a week after Prime Minister Narendra Modi expressed concerns on call drop problem being faced by consumers across country.

    काली मिर्च के मूल स्थान और उपयोग

    वनस्पति जगत्‌ में पिप्पली कुल (Piperaceae) के मरिचपिप्पली (Piper nigrum) नामक लता सदृश बारहमासी पौधे के अधपके और सूखे फलों का नाम काली मिर्च (Pepper) है। पके हुए सूखे फलों को छिलकों से बिलगाकर सफेद गोल मिर्च बनाई जाती है जिसका व्यास लगभग ५ मिमी होता है। यहमसाले के रूप में प्रयुक्त होती है।
    Spices in an Indian market.jpg

    मूल स्थान तथा उत्पादक देश ;  

    काली मिर्च के पौधे का मूल स्थान दक्षिण भारत ही माना जाता है। भारत से बाहर इंडोनेशिया, बोर्नियो, इंडोचीन, मलय, लंका और स्याम इत्यादि देशों में भी इसकी खेती की जाती है। विश्वप्रसिद्ध भारतीय गरम मसाले में, ऐतिहासिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से, काली मिर्च का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका वर्णन और उपयोग प्राचीन काल से चला आ रहा है। ग्रीस, रोम, पुर्तगाल इत्यादि संसार के विभिन्न देशों के सहस्रों वर्ष पुराने इतिहास में भी इसका वर्णन मिलता है। 15वीं शती में वास्को-डि-गामा द्वारा समुद्रमार्ग से भारत के सुप्रसिद्ध मलाबार के तटवर्ती इलाकों की खोज का मुख्य कारण भी काली मिर्च के व्यापार का आर्थिक महत्व ही था।
    काली मिर्च का पौधा त्रावणकोर और मालाबार के जंगलों में बहुलता से उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त त्रावणकोर, कोचीन, मलाबार, मैसूर, कुर्ग, महाराष्ट्र तथा असम के सिलहट और खासी के पहाड़ी इलाकों में बहुतांश में उपजाया भी जाता है। दक्षिण भारत के बहुत से भागों में इसकी खेती घर-घर होती है। वास्तव में काली मिर्च के भारतीय क्षेत्र का विस्तार उत्तर मलाबार और कोंकण से लेकर दक्षिण में त्रावणकोर कोचीन तक समझा जाना चाहिए।

    व्यापार ;

    आज काली मिर्च अंतरराष्ट्रीय व्यापार का एक महत्वपूर्ण पदार्थ है। संसार के कुल देशों में काली मिर्च का उत्पादन गत महायुद्ध के पूर्व के 96,525 मीटरी टनों से गिरकर लगभग 45,725 मीटरी टनों पर पहुँच गया था। इस भारी कमी का मुख्य कारण गत महायुद्ध में इंडोनेशिया की काली मिर्च की खेती का सर्वनाश ही समझना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में केवल भारत का उत्पादन ही महायुद्ध के पूर्व के 18,800 मीटरी टनों से बढ़कर 25,400 मीटरी टनों से ऊपर पहुँचा है।

    खेती ;

    • काली मिर्च का पौधा हरे भरे वृक्षों और दीमक से

    Thursday, 3 September 2015

    Career in Agriculture (Seven Types of Agricultural Careers)

    Agricultural career options go well beyond farming and ranching. If you love the idea of working with crops, animals and resources that contribute to the worldwide food supply, pursuing a career in agriculture could provide you with a rewarding and fulfilling future.

    Agriculture is big business. The industry has been around for thousands of years and, according to AgDay, approximately 22 million Americans are involved in agriculture-related industries. There are so many career possibilities, that it's easier to segment career choices by field, rather than specific jobs.

    1. Agricultural Communications ;

    Agriculture is such a big business that many of the major agricultural, farming and ranching companies house departments dedicated to promoting and marketing their products. Individuals involved in agricultural communications often work as marketers, public relations experts or journalists. Common job titles include:
    • Market news reporter
    • Farm news reporter
    • Public relations representative
    • Advertising specialist
    • Marketing communications manager
    • Regional sales manager
    • Account manager
    While most of these positions will require a minimum of a bachelor's degree in business, journalism or a related field, you may be able to pursue sales jobs with limited formal education.


    2. Agricultural Economics ;

    Someone has to price, broker and assess the agricultural economy from day to day and year to year. The fact is that the agricultural economy can be greatly affected by issues like drought, flood and outbreaks of food borne illness. It's the role of the agricultural economist to address these issues. Common job titles include:
    • Grain broker
    • Farm and land appraiser
    • Resource economist consultant
    • Agricultural policy analyst
    • Insurance agent
    • Food distribution manager
    • Agricultural lender

    3. Agricultural Education ;

    Someone has to teach agricultural courses and pursue agricultural research. This largely falls on the shoulders of instructors and education specialists within the agricultural education field. While you may think teachers only exist within high school and college settings, many large agricultural organizations also employ agriculture educators and researchers. Common jobs include:

    • Education specialist
    • Education supervisor
    • Farm management
    • Soil conservationist
    • Extension advisor
    4. Agricultural Engineering ;

    One area of agriculture that requires an advanced degree within a field of engineering is agricultural engineering. Agriculture requires the extensive use of machinery, buildings, water lines and waste management, all which require expert knowledge to keep the food supply safe. Consider the following opportunities:
    • Structural engineer
    • Irrigation engineer
    • Sanitary/waste handling
    • Food engineer
    • Bioprocessing engineer
    • Machine design engineer
    5. Agronomy/Soils ;

    Agronomy deals with soil management and crop production. Most upper level positions within this field require an advanced degree in agriculture, biology or genetics, but there are some positions (particularly those in sales) that may require only a high school education and experience within the field. Opportunities include:
    • Crop specialist
    • Soil scientist
    • Fertilizer sales representative
    • Plant breeder
    • Plant geneticist
    • Soil conservationist
    • Soil surveyor
    • Farm supply representative
    6. Animal Sciences ;





    If you love working with livestock like pigs, cattle or horses, you may want to look into careers within animal sciences. These individuals may help with the care of animals as ranch hands or breeders, or they may take on more scientific roles as large animal veterinarians or animal geneticists. Consider the following job possibilities:
    • Livestock production manager
    • Feed sales/management
    • Livestock procurement
    • Livestock insurance representative
    • Veterinarian
    • Farm management
    • Stable management
    • Livestock feedlot operator
    • Ranch/farm hand
    • Animal scientist
    • Animal geneticist
    7. Food Sciences ;

    It's one thing to have crops and livestock on a ranch, but it's another thing entirely to turn those resources into food that's ready to be placed on the table in homes around the world. Individuals involved in food sciences deal with safety, research and product development before the food hits the shelves. Roles include:
    • Food product research and development
    • Quality assurance
    • Food chemist
    • Food microbiologist
    • Food manufacturing
    • Food researcher
     
    Agricultural Education ;

    Most state colleges and universities offer opportunities for undergraduate and graduate degrees within agriculture. Even if the schools you're most interested in don't appear to offer specific degrees in agriculture, pursuing an advanced degree in science, business or journalism could help you take coursework that would provide the same basic background required for a career in agriculture. It's a good idea to talk to a college counselor before signing up for classes to ensure that you're on the right track.

    Gaining Experience ;

    If you're not quite ready to commit to a particular college or career field, see if there are farms, ranches, stables, feed supply stores or agricultural sales companies that would be willing to take on an apprentice, intern or part-time employee. Working within these areas of agriculture could help you pinpoint the field that you're most interested in while also helping you earn a living. These are also good opportunities to pursue during the summer while receiving your degree because they show future employers that you've gained hands-on experience in a professional setting.