Monday, 15 August 2016

पशुजन्य उत्पादन , अण्डा उत्पादन ,प्रति भेड़ औसत एवं कुल ऊन उत्पादन



औसत एवं कुल दुग्ध उत्पादन
 
वर्ष
औसत दुग्ध उत्पादन (किलोग्राम)
कुल वार्षिक दुग्ध उत्पादन        (लाख मीट्रिक टन)
गाय
भैंस
बकरी
गाय
भैंस
बकरी
देशी
क्रास बेड
देशी
क्रास बेड
2003-04
2.409
6.735
4.256
0.703
30.13
14.26
105.12
9.91
2004-05
2.455
6.804
4.314
0.711
31.02
14.84
109.08
10.17
2005-06
2.464
6.890
4.318
0.715
31.09
13.44
118.84
10.19
2006-07
2.489
6.977
4.328
0.726
32.294
13.982
124.139
10.531
2007-08
2.506
7.003
4.353
0.729
33.528
14.567
129.566
10.932
2008-09
2.523 7.024 4.373 0.734 34.66 15.10 134.32 11.29
2009-10 2.536 7.038 4.392 0.736 35.75 15.67 139.02 11.59
2010-11 2.564 7.069 4.431 0.741 37.092 16.336 144.970 11.935
 
  अण्डा उत्पादन
 
वर्ष
प्रति वार्षिक मुर्गी अण्डा उत्पादन (संख्या)
कुल वार्षिक अण्डा उत्पादन        ( करोड में)
 
अवर्णित
उन्नतशील
अवर्णित
उन्नतशील
2003-04
140.00
241.20
44.24
43.16
2004-05
140.10
241.90
45.26
44.92
2005-06
141.40
241.70
43.37
48.91
2006-07
145.10
243.10
43.02
51.82
2007-08
145.60
244.60
44.38
53.77
2008-09 146.30 245.40 45.67 55.75
2009-10 146.80 245.60 47.32 58.65
2010-11 147.80 246.90 48.90 61.02
 
प्रति भेड़ औसत एवं कुल ऊन उत्पादन
 
वर्ष
प्र​ति भेड औसत ऊन उत्पादन      (कि0ग्रा0 में)
कुल ऊन उत्पादन   
   
 
(लाख कि0ग्रा0 में)
2003-04
0.866
19.294
2004-05
0.875
19.648
2005-06
0.879
14.590
2006-07
0.882
14.608
2007-08
0.884
14.802
2008-09 0.887 15.030
2009-10 0.890 15.240
2010-11 0.894 15.462
 
 
                प्र​ति पशु औसत मांस उत्पादन(रजिस्टर्ड बधालयो पर)
(कि0ग्रा0 में)
 
वर्ष
भेड़
बकरी
सूकर
भैंस
2003-04
16.709
16.149
45.129
121.678
2004-05
16.505
16.063
44.572
121.731
2005-06
16.554
16.133
44.507
120.759
2006-07
16.728
16.083
43.706
121.225
2007-08
16.743
16.098
43.692
120.932
2008-09 16.710 16.117 43.554 122.084
2009-10 16.687 16.052 43.407 121.699
2010-11 16.661 16.069 43.815 122.118
 



कुल मांस उत्पादन (रजिस्टर्ड बधालयो पर)
(लाख कि0ग्रा0 में)
 
वर्ष
बकरी
भेड़
सूकर
भैंस
2003-04
313.507
56.318
109.292
1390.426
2004-05
325.534
50.775
115.682
1410.221
2005-06
331.016
50.391
122.884
1479.301
2006-07
327.921
52.620
146.191
1475.577
2007-08
334.892
52.355
148.565
1498.475
2008-09 330.694 51.799 138.185 1357.528
2009-10 329.182 53.809 140.962 1244.626
2010-11 339.319 56.203 146.651 1319.852
 

Monday, 14 March 2016

किसानों की आय दोगुना करने का रोडमेप बनाएं

apc jpgभोपाल। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि वर्ष 2022 तक प्रदेश के किसानों की आमदनी दोगुनी करने का रोडमेप बनाया जायेगा। इसका नोडल विभाग किसान-कल्याण एवं कृषि विकास रहेगा तथा इसमें उद्यानिकी, पशु चिकित्सा आदि विभाग शामिल रहेंगे। उन्होंने कहा कि कामधेनु ब्रीडिंग सेंटर आगर में बनाया जायेगा। इस संबंध में मुख्यमंत्री ने संबंधित अधिकारियों की बैठक ली और उन्हें व्यापक दिशा-निर्देश दिये।
बैठक में किसान-कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री श्री गौरीशंकर बिसेन, कृषि उत्पादन आयुक्त श्री पी.सी. मीणा, प्रमुख सचिव कृषि डॉ. राजेश राजौरा, प्रमुख सचिव पशुपालन श्री प्रभांशु कमल, प्रमुख सचिव उद्यानिकी श्री अशोक वर्णवाल आदि अधिकारी उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि मृदा स्वास्थ्य कॉर्ड योजना भारत शासन का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम में स्वाईल हेल्थ कॉर्ड बनाने का काम और तेज किया जाये। उन्होंने कहा कि किसानों की आमदनी बढ़ाने में उद्यानिकी की महत्वपूर्ण भूमिका है। उद्यानिकी कार्यक्रमों का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से किया जाये।
इस मौके पर मुख्यमंत्री ने पशु चिकित्सा विभाग के अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि कामधेनु ब्रीडिंग सेंटर आगर में बनाया जायेगा। इसका काम शीघ्र शुरू किया जायेगा। उन्होंने कृषि विभाग से जुड़े अन्य कार्यक्रम की भी जानकारी प्राप्त की।

बहुत सुंदर सुगंधित फूल गुलाब

गुलाब एक बहुवर्षीय, झाड़ीदार, कंटीला, पुष्पीय पौधा है जिसमें बहुत सुंदर सुगंधित फूल लगते हैं। इसकी १०० से अधिक जातियां हैं जिनमें से अधिकांश एशियाई मूल की हैं। जबकि कुछ जातियों के मूल प्रदेश यूरोप, उत्तरी अमेरिका तथा उत्तरी पश्चिमी अफ्रीका भी है। भारत सरकार ने १२ फरवरी को 'गुलाब-दिवस' घोषित किया है। गुलाब का फूल कोमलता और सुंदरता के लिये प्रसिद्ध है, इसी से लोग छोटे बच्चों की उपमा गुलाब के फूल से देते हैं।

परिचय

गुलाब प्रायः सर्वत्र १९ से लेकर ७० अक्षांश तक भूगोल के उत्तरार्ध में होता है। भारतवर्ष में यह पौधा बहुत दिनों से लगाया जाता है और कई स्थानों में जंगली भी पाया जाता है। कश्मीर और भूटान में पीले फूल के जंगली गुलाब बहुत मिलते हैं। वन्य अवस्था में गुलाब में चार-पाँच छितराई हुई पंखड़ियों की एक हरी पंक्ति होती है पर बगीचों में सेवा और यत्नपूर्वक लगाए जाने से पंखड़ियों की संख्या में बृद्धि होती है पर केसरों की संख्या घट जाती हैं। कलम पैबंद आदि के द्बारा सैकड़ों प्रकार के फूलवाले गुलाब भिन्न-भिन्न जातियों के मेल से उत्पन्न किए जाते हैं। गुलाब की कलम ही लगाई जाती है। इसके फूल कई रंगों के होते हैं, लाल (कई मेल के हलके गहरे) पीले, सफेद इत्यादि। सफेद फूल के गुलाब को सेवती कहते हैं। कहीं कहीं हरे और काले रंग के भी फूल होते हैं। लता की तरह चढ़नेवाले गुलाब के झड़ भी होते हैं जो बगीचों में टट्टियों पर चढ़ाए जाते हैं। ऋतु के अनुसार गुलाब के दो भेद भारतबर्ष में माने जाने हैं सदागुलाब और चैती। सदागुलाब प्रत्येक ऋतु में फूलता और चैती गुलाब केवल बसंत ऋतु में। चैती गुलाब में विशेष सुगंध होती है और वही इत्र और दवा के काम का समझ जाता है।
भारतवर्ष में जो चैती गुलाब होते है वे प्रायः बसरा या दमिश्क जाति के हैं। ऐसे गुलाब की खेती गाजीपुर में इत्र और गुलाबजल के लिये बहुत होती है। एक बीघे में प्रायः हजार पौधे आते हैं जो चैत में फूलते है। बड़े तड़के उनके फूल तोड़ लिए जाते हैं और अत्तारों के पास भेज दिए जाते हैं। वे देग और भभके से उनका जल खींचते हैं। देग से एक पतली बाँस की नली एक दूसरे बर्तन में गई होती है जिसे भभका कहते हैं और जो पानी से भरी नाँद में रक्खा रहता है। अत्तार पानी के साथ फूलों को देग में रख देते है जिसमें में सुगंधित भाप उठकर भभके के बर्तन में सरदी से द्रव होकर टपकती है। यही टपकी हुई भाप गुलाबजल है।
गुलाब का इत्र बनाने की सीधी युक्ति यह है कि गुलाबजल को एक छिछले बरतन में रखकर बरतन को गोली जमीन में कुछ गाड़कर रात भर खुले मैदान में पडा़ रहने दे। सुबह सर्दी से गुलाबजल के ऊपर इत्र की बहुत पतली मलाई सी पड़ी मिलेगी जिसे हाथ से काँछ ले। ऐसा कहा जाता है कि गुलाब का इत्र नूरजहाँ ने १६१२ ईसवी में अपने विवाह के अवसर पर निकाला था।
भारतवर्ष में गुलाब जंगली रूप में उगता है पर बगीचों में दह कितने दिनों से लगाया जाता है। इसका ठीक पता नहीं लगता। कुछ लोग 'शतपत्री', 'पाटलि' आदि शब्दों को गुलाब का पर्याय मानते है। रशीउद्दीन नामक एक मुसलमान लेखक ने लिखा है कि चौदहवीं शताब्दी में गुजरात में सत्तर प्रकार के गुलाब लगाए जाते थे। बाबर ने भी गुलाब लगाने की बात लिखी है। जहाँगीर ने तो लिखा है कि हिंदुस्तान में सब प्रकार के गुलाब होते है।

साहित्य में

भारतीय साहित्य में- गुलाब के अनेक संस्कृत पर्याय है। अपनी रंगीन पंखुड़ियों के कारण गुलाब पाटल है, सदैव तरूण होने के कारण तरूणी, शत पत्रों के घिरे होने पर ‘शतपत्री’, कानों की आकृति से ‘कार्णिका’, सुन्दर केशर से युक्त होने ‘चारुकेशर’, लालिमा रंग के कारण ‘लाक्षा’ और गन्ध पूर्ण होने से गन्धाढ्य कहलाता है। फारसी में गुलाब कहा जाता है और अंगरेज़ी में रोज, बंगला में गोलाप, तामिल में इराशा और तेलुगु में गुलाबि है। अरबी में गुलाब ‘वर्दे’ अहमर है। सभी भाषाओं में यह लावण्य और रसात्मक है। शिव पुराण में गुलाब को देव पुष्प कहा गया है। ये रंग बिरंगे नाम गुलाब के वैविध्य गुणों के कारण इंगित करते हैं।
विश्व साहित्य- गुलाब ने अपनी गन्ध और रंग से विश्व काव्य को अपना माधुर्य और सौन्दर्य प्रदान किया है। रोम के प्राचीन कवि वर्जिल ने अपनी कविता में वसन्त में खिलने वाले सीरिया देश के गुलाब की चर्चा की है। अंगरेज़ी साहित्य के कवि टामस हूड ने गुलाब को समय के प्रतिमान के रुप में प्रस्तुत किया है। कवि मैथ्यू आरनाल्ड ने गुलाब को प्रकृति का अनोखा वरदान कहा है। टेनिसन ने अपनी कविता में नारी को गुलाब से उपमित किया है। हिन्दी के श्रृंगारी कवि ने गुलाब को रसिक पुष्प के रुप में चित्रित किया है ‘फूल्यौ रहे गंवई गाँव में गुलाब’। कवि देव ने अपनी कविता में बालक बसन्त का स्वागत गुलाब द्वारा किए जाने का चित्रण किया है। कवि श्री निराला ने गुलाब को पूंजीवादी और शोषक के रुप में अंकित किया है। रामवृक्ष बेनीपुरी ने इसे संस्कृति का प्रतीक कहा है।[1]

इतिहास में


एक लाल गुलाब
इतिहास में वर्णन मिलता है कि असीरिया की शाहजादी पीले गुलाब से प्रेम करती थी और मुगल बेगम नूरजहाँ को लाल गुलाब अधिक प्रिय था। मुगलानी जेबुन्निसा अपनी फारसी शायरी में कहती है ‘मैं इतनी सुन्दर हूँ कि मेरे सौन्दर्य को देखकर गुवाब के रंग फीके पड़ जाते हैं।‘ रजवाडे़ गुलाब के बागीचे लगवाते थे। सीरिया के बाशाद गुलाबों का बाग स्थापित करते थे। पं॰ जवाहर लाल नेहरू गुलाब के प्रतीक माने जाते हैं। यूरोप के दो देशों का राष्ट्रीय पुष्प सफेद गुलाब और दूसरे देश का राष्ट्रीय पुष्प लाल गुलाब थे। दोनों देशों के बीच गुलाब युद्ध छिड़ गया था। इसके बावजूद यूरोप के कुछ देशों ने गुलाब को अपना राष्ट्रीय पुष्प घोषित किया है। राजस्थान की राजधानी जयपुर को गुलाबी नगर कहा जाता है। गुलाब के इत्र का आविष्कार नूरजहाँ ने किया था।

खेती


एक आधुनिक शंकर गुलाब
ग्रामीण किसान गुलाब की खेती कर अपनी आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करते है।[2] भारत में सुगन्धित उद्योग और गुलाब की खेती पुरानी है परन्तु उत्पादन की दृष्टि से यह अन्य देशों जैसे कि बुलगारिया, टर्की, रुस, फ्रांस, इटली और चीन से काफी पिछड़ा हुआ है। भारत में उत्तर प्रदेश के हाथरस, एटा, बलिया, कन्नौज, फर्रुखाबाद, कानपुर, गाजीपुर, राजस्थान के उदयपुर (हल्दीघाटी), चित्तौड़, जम्मू और कश्मीर में, हिमाचल इत्यादि राज्यों में २ हजार हे० भूमि में दमिश्क प्रजाति के गुलाब की खेती होती है। यह गुलाब चिकनी मिट्टी से लेकर बलुई मिट्टी जिसका पी०एच० मान ७.०-८.५ तक में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। दमिश्क गुलाब शीतोष्ण और समशीतोष्ण दोनों ही प्रकार की जलवायु में अच्छी तरह उगाया जा सकता है। समशीतोष्ण मैदानी भागों में जहाँ पर शीत काल के दौरान अभिशीतित तापक्रम (चिल्ड ताप) तापक्रम लगभग १ माह तक हो वहाँ भी सफलतापूर्वक की जा सकती है।

वर्गीकरण

पौधों की बनावट, ऊँचाई, फूलों के आकार आदि के आधार पर इन्हें निम्नलिखित पाँच वर्गों में बाँटा गया है।[3]
  • हाइब्रिड टी- यह बड़े फूलों वाला महत्वपूर्ण वर्ग है इस वर्ग के पौधे झाङीनुमा, लम्बे और फैलने वाले होते है इनकी विशेषता यह है कि प्रत्येक शाखा पर एक फूल निकलता है, जो अत्यन्त सुन्दर होता है हालाँकि कुछ ऐसी किस्में भी हैं, जिनमें छोटे समूह में भी फूल लगते है अधिक पाला पङने की स्थिति में कभी-कभी पौधे मर जाते है इस वर्ग की प्रमुख किस्में है एम्बेसडर, अमेरिकन प्राइड, बरगण्डा, डबल, डिलाइट, फ्रेण्डसिप, सुपरस्टार, रक्त गंधा, क्रिमसनग्लोरी, अर्जुन, जवाहर, रजनी, रक्तगंधा, सिद्धार्थ, सुकन्या, फस्टे रेड, रक्तिमा और ग्रांडेमाला आदि
  • फ्लोरीबण्डा- इस वर्ग में आने वाली किस्मों के फूल हाइब्रिड टी किस्मों की तुलना में छोटे होते है और अधिक संख्या में फूल लगते है इस वर्ग की प्रमुख किस्में है- जम्बरा, अरेबियन नाइटस, रम्बा वर्ग, चरिया, आइसबर्ग, फर्स्ट एडीसन, लहर, बंजारन, जंतर-मंतर, सदाबहार, प्रेमा और अरुणिमा आदि
  • पॉलिएन्था : इस वर्ग के पौधों को घरेलू बगीचों व गमलों में लगाने के लिए पसंद किया जाता है। पौधे और फूलों का आकार हाइब्रिड डी एवं फ्लोरी बंडा वर्ग से छोटा होता है लेकिन गुच्छा आकार में फ्लोरीबंडा वर्ग से भी बड़ा होता है। एक गुच्छे में कई फूल होते हैं। क्योंकि इनमें मध्यम आकार के फूल अधिक संख्या में साल में अधिक समय तक आते रहते हैं इसलिए यह घरों में शोभा बढ़ाने वाले पौधों के रूप में बहुतायत से प्रयोग में लाया जाता है। इस वर्ग की प्रमुख किस्में स्वाति, इको, अंजनी आदि हैं।
  • मिनीएचर : इस वर्ग में आने वाली किस्मों को बेबी गुलाब, मिनी गुलाब या लघु गुलाब के नाम से जाना जाता है। ये कम लंबाई के छोटे बौने पौधे होते हैं। इनकी पत्तियों व फूलों का आकार छोटा होने के कारण इन्हें बेबी गुलाब भी कहते हैं। ये छोटे किंतु संख्या में बहुत अधिक लगते हैं। इन्हें ब़ड़े शहरों में बंगलों, फ्लैटों आदि में छोटे गमलों में लगाया जाना उपयुक्त रहता है, परंतु धूप की आवश्यकता अन्य गुलाबों के समान छः से आठ घंटे आवश्यक है। इन्हें गमलों में या खिङकियों के सामने की क्यारियों में सुगमता से उगाया जा सकता हैइस वर्ग की प्रमुख किस्में ड्वार्फ किंग, बेबी डार्लिंग, क्रीकी, रोज मेरिन, सिल्वर टिप्स आदि हैं।
  • लता गुलाब- इस वर्ग में कुछ हाइब्रिड टी फ्लोरीबण्डा गुलाबोँ की शाखाएँ लताओं की भाँति बढती है जिसके कारण उन्हें लता गुलाब की संज्ञा दी जाती है इन लताओं पर लगे फूल अत्यन्त सुन्दर दृश्य प्रस्तुत करते है। इन्हें मेहराब या अन्य किसी सहारे के साथ चढ़ाया जा सकता है। इनमें फूल एक से तीन (क्लाइंबर) व गुच्छों (रेम्बलर) में लगते हैं। लता वर्ग की प्रचलित किस्में गोल्डन शावर, कॉकटेल, रायल गोल्ड और रेम्बलर वर्ग की एलवटाइन, एक्सेलसा, डोराथी पार्किंस आदि हैं। कासिनों, प्रोस्पेरीटी, मार्शलनील, क्लाइबिंग, कोट टेल आदि भी लोकप्रिय हैं।
  • नवीनतम किस्में- पूसा गौरव, पूसा बहादुर, पूसा प्रिया, पूसा बारहमासी, पूसा विरांगना, पूसा पिताम्बर, पूसा गरिमा और डा भरत राम

पुष्प

गुलाब के पौधे में पुष्पासन जायांग से होता हुआ लम्बाई में वृद्धि करता है तथा पत्तियों को धारण करता है। हरे गुलाब के पुष्पत्र पत्ती की तरह दिखाई देते हैं। पुष्पासन छिछला, चपटा या प्याले का रूप धारण करता है। जायांग पुष्पासन के बीच में तथा अन्य पुष्पयत्र प्यालानुमा रचना की नेमि या किनारों पर स्थित होते हैं। इनमें अंडाशय अर्ध-अधोवर्ती तथा अन्य पुष्पयत्र अधोवर्ती कहलाते है। पांच अखरित या बहुत छोटे नखरवाले दल के दलफलक बाहर की तरफ फैले होते हैं। पंकेशर लंबाई में असमान होते है अर्थात हेप्लोस्टीमोनस. बहुअंडपी अंडाशय, अंडप संयोजन नहीं करते हैं तथा एक-दुसरे से अलग-अलग रहते हैं, इस अंडाशय को वियुक्तांडपी कहते हैं और इसमें एक अंडप एक अंडाशय का निर्माण करता है।

आर्थिक महत्व

फूल के हाट में गुलाब के गजरे खूब बिकते हैं।[4] गुलाब की पंखुडियों और शक्कर से गुलकन्द बनाया जाता है। गुलाब जल और गुलाब इत्र के कुटीर उद्योग चलते है। उत्तर प्रदेश में कन्नौज, जौनपुर आदि में गुलाब के उत्पाद की उद्योगशाला चलती है। दक्षिण भारत में भी गुलाब के उत्पाद के उद्योग चलते हैं। दक्षिण भारत में गुलाब फूलों का खूब व्यापार होता है। मन्दिरों, मण्डपों, समारोहों, पूजा-स्थलों आदि स्थानों में गुलाब फूलों की भारी खपत होती है। यह अर्थिक लाभ का साधन है। वहाँ हजारों ग्रामीण युवा फूलो को अपनी आय का माध्यम बना लेते हैं।

Tuesday, 16 February 2016

Here Are 10 Pictures of Your Daily Recommended Servings of Fruits & Vegetables




What's the most important part of a nutritious diet? Most of us can automatically recite the answer: fruits and vegetables. And yet it can be tough to eat the daily recommended amount of produce, and most Americans simply don't. I've certainly been among that 75% — the estimated percentage of us who don't eat enough veggies.
I realized, though, that part of the problem was that I didn't really understand how much we were talking about. What does a daily recommended amount of fruits and vegetables look like? I decided to find out, once and for all. Here are 10 photos of fruits and vegetables, each one a complete daily serving. It might not be as much as you think!