Tuesday, 8 December 2015

खरीफ प्याज उत्पादन तकनीक

परिचय

प्याज एक महत्वपूर्ण सब्जी एवं मसाला फसल है। इसमें प्रोटीन एवं कुछ विटामिन भी अल्प मात्रा में रहते हैं। प्याज में बहुत से औषधीय गुण पाये जाते हैं। प्याज का सूप, अचार एवं सलाद के रूप में उपयोग किया जाता है। भारत के प्याज उत्पादक राज्यों में महाराष्ट्र, गुजरात, उ.प्र., उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडू, म.प्र.,आन्ध्रप्रदेश एवं बिहार प्रमुख हैं। मध्यप्रदेश भारत का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक प्रदेश है। म.प्र. में प्याज की खेती खंण्डवा, शाजापुर, रतलाम छिंन्दवाड़ा, सागर एवं इन्दौर में मुख्य रूप से की जाती है। सामान्य रूप में सभी जिलों में प्याज की खेती की जाती है। भारत से प्याज का निर्यात मलेशिया, यू.ए.ई. कनाडा,जापान,लेबनान एवं कुवैत में निर्यात किया जाता है।

जलवायु

यद्यपि प्याज ठण्डे मौसम की फसल है,लेकिन इसे खरीफ में भी उगाया जा सकता है। कंद निर्माण के पूर्व प्याज की फसल के लिए लगभग 210 से.ग्रे.तापक्रम उपयुक्त माना जाता है। जबकि शल्क कंदों में विकास के लिए 150 से.ग्रे. से 250 से.ग्रे.का तापक्रम उत्तम रहता है।

मृदा

प्याज की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है। प्याज की खेती के लिए उचित जलनिकास एवं जीवांशयुक्त उपजाऊ दोमट तथा बालुई दोमट भूमि जिसका पी.एच.मान 6.5-7.5 के मध्य हो सर्वोत्तम होती है, प्याज को अधिक क्षारीय या दलदली मृदाओं में नही उगाना चाहिए।

उन्नत किस्में

म.प्र में खरीफ प्याज की प्रमुख उन्नत किस्में निम्नलिखित हैं-
एग्री फाउंड डार्क रेड
यह किस्म भारत में सभी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसके शल्क कन्द गोलाकार, 4-6 सेमी. आकार वाले, परिपक्वता अवधि 95-110, औसत उपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर। यह किस्म खरीफ प्याज(वर्षात की प्याज)उगाने के लिए अनुशंसित है।
एन-53
भारत के सभी क्षेत्रों में उगाया जा सकता है, इसकी परिपक्वता अवधि 140 दिन, औसत उपज 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, इसे खरीफ प्याज (वर्षातकी प्याज) उगाने हेतु अनुशंसित किस्म हैं।
भीमा सुपर
यह किस्म भी खरीफ एवं पिछेती खरीफ के लिये उपयुक्त है। यह किस्म 110-115 दिन में तैयार हो जाती है तथा प्रति हेक्टेयर 250-300 क्विंटल तक उपज देती है।

एग्री फाउंड डार्क रेड               एन-53 भीमा सुपर

भूमि की तैयारी

प्याज के सफल उत्पादन में भूमि की तैयारी का विशेष महत्व है। खेत की प्रथम जुताई मिट्‌टी पलटने वाले हल से करना चाहिए। इसके उपरान्त 2 से 3 जुताई कल्टीवेटर या हैरा से करें, प्रत्येक जुताई के पश्चात्‌ पाटा अवश्य लगाएं जिससे नमी सुरक्षित रहे तथा साथ ही मिट्‌टी भुर-भुरी हो जाए। भूमि को सतह से 15 से.मी.उंचाई पर1.2 मीटर चौड़ी पट्‌टी पर रोपाई की जाती है अतः खेत को रेज्ड-बेड सिस्टम से तैयार किया जाना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

प्याज की फसल को अधिक मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। प्याज की फसल में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना चाहिए। गोबर की सड़ी खाद 20-25 टन/हेक्टेयर रोपाई से एक-दो माह पूर्व खेत में डालना चाहिए। इसके अतिरिक्त नत्रजन 100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर, स्फुर 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर तथा पोटाश 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर देने की अनुसंशा की जाती हैं। इसके अतिरिक्त सल्फर 25 कि.ग्रा. एवं जिंक 5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर प्याज की गुणवत्ता सुधारने के लिए आवश्यक होते हैं।

पौध तैयार करना

पौधशाला के लिए चुनी हुई जगह की पहले जुताई करें इसके पश्चात्‌ उसमें पर्याप्त मात्रा में गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट डालना चाहिए। पौधशाला का आकार 3 मीटर*0.75 मीटर रखा जाता हैं और दो क्यारियों के बीच 60-70 सेमी. की दूरी रखी जाती हैं जिससे कृषि कार्य आसानी से किये जा सके। पौधशाला के लिए रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त रहती है, पौध शैय्या लगभग 15 सेमी. जमीन से ऊँचाई पर बनाना चाहिए बुवाई के बाद शैय्या में बीजों को 2-3 सेमी. मोटी सतह जिसमें छनी हुई महीन मृदा एवं सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद से ढंक देना चाहिए। बुवाई से पूर्व शैय्या को 250 गेज पालीथीन द्वारा सौर्यकरण उपचारित कर लें।
बीजों को हमेशा पंक्तियों में बोना चाहिए। खरीफ मौसम की फसल के लिए 5-7 सेमी. लाइन से लाइन की दूरी रखते हैं। इसके पश्चात्‌ क्यारियों पर कम्पोस्ट, सूखी घास की पलवार(मल्चिंग) बिछा देते हैं जिससे भूमि में नमी संरक्षण हो सके। पौधशाला में अंकुरण हो जाने के बाद पलवार हटा देना चाहिए। इस बात का ध्यान रखा जाये कि पौधशाला की सिंचाई पहले फब्बारे से करना चाहिए। पौधों को अधिक वर्षा से बचाने के लिए पौधशाला या रोपणी को पॉलीटेनल में उगाना उपयुक्त होगा।

बीज की मात्रा

खरीफ मौसम के लिए 15-20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती हैं।

पौधशाला शैय्या पर बीज की बुआई एवं रोपाई का समय

खरीफ मौसम हेतु पौधशाला शैय्या पर बीजों की पंक्तियों में बुवाई 1-15 जून तक कर देना चाहिए, जब पौध 45 दिन की हो जाएं तो उसकी रोपाई कर देना उत्तम माना जाता है।
पौध की रोपाई कूड़ शैय्या पद्धति से तैयार खेतों पर करना चाहिए, इसमें 1.2 मीटर चौड़ी शैय्या एवं लगभग 30 से.मी. चौड़ी नाली तैयार की जाती हैं।

खरपतवार नियंत्रण

फसल को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए कुल 3 से 4 निराई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है। प्याज के पौधे एक-दूसरे के नजदीक लगाये जाते है तथा इनकी जड़ें भी उथली रहती है अतः खरपतवार नष्ट करने के लिए रासायनिक पदार्थों का उपयोग किया जाना उचित होता है। इसके लिए पैन्डीमैथेलिन 2.5 से 3.5 लीटर/हेक्टेयर अथवा ऑक्सीफ्लोरोफेन 600-1000 मिली/हेक्टेयर खरपतवार नाशक पौध की रोपाई के 3 दिन पश्चात 750 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना बहुत प्रभावी और उपयुक्त पाया गया है।

सिंचाई एवं जल निकास

खरीफ मौसम की फसल में रोपण के तुरन्त बाद सिंचाई करना चाहिए अन्यथा सिंचाई में देरी से पौधे मरने की संभावना बढ़ जाती हैं। खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली प्याज की फसल को जब मानसून चला जाता है उस समय सिंचाईयाँ आवश्यकतानुसार करना चाहिएं। इस बात का ध्यान रखा जाए कि शल्ककंद निर्माण के समय पानी की कमी नहीं होना चाहिए क्योंकि यह प्याज फसल की क्रान्तिक अवस्था होती है क्योंकि इस अवस्था में पानी की कमी के कारण उपज में भारी कमी हो जाती है, जबकि अधिक मात्रा में पानी बैंगनी धब्बा(पर्पिल ब्लाच) रोग को आमंत्रित करता है। काफी लम्बे समय तक खेत को सूखा नहीं रखना चाहिए अन्यथा शल्ककंद फट जाएंगे एवं फसल जल्दी आ जाएगी, परिणामस्वरूप उत्पादन कम प्राप्त होगा। अतः आवश्यकतानुसार 8-10 दिन के अंतराल से हल्की सिंचाई करना चाहिए।
यदि अधिक वर्षा या अन्य कारण से खेत में पानी रूक जाए तो उसे शीघ्र निकालने की व्यवस्था करना चाहिए अन्यथा फसल में फफूंदी जनित रोग लगने की संभावना बढ़ जाती हैं।

कंदों की खुदाई

खरीफ प्याज की फसल लगभग 5 माह में नवम्बर-दिसम्बर माह में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। जैसे ही प्याज की गाँठ अपना पूरा आकर ले लेती है और पत्तियां सूखने लगें तो लगभग 10-15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिए और प्याज के पौधों के शीर्ष को पैर की मदद से कुचल देना चाहिए। इससे कंद ठोस हो जाते हैं और उनकी वृद्धि रूक जाती है। इसके बाद कंदों को खोदकर खेत में ही कतारों में ही रखकर सुखाते है।

फसल सुरक्षा

1. थ्रिप्स
ये कीट पत्तियों का रस चूसते हैं जिसके कारण पत्तियों पर चमकीली चांदी जैसी धारियां या भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। ये बहुत छोटे पीले या सफेद रंग के कीट होते हैं जो मुख्य रूप से पत्तियों के आधार या पत्तियों के मध्य में घूमते हैं।
इसके नियंत्रण हेतु नीम तेल आधारित कीटनाशियों का छिड़काव करें या इमीडाक्लोप्रि कीटनाशी 17.8 एस.एल. दवा की मात्रा 125 मिली./हे. 500-600 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
2. माइट
इस कीट के प्रकोप के कारण पत्तियों पर धब्बों का निर्माण हो जाता हैं और पौधे बौने रह जाते हैं। इसके नियंत्रण हेतु 0.05: डाइमेथोएट दवा का छिड़काव करें।
यह एक फफूंदी जनित रोग है, इस रोग का प्रकोप दो परिस्थितियों में अधिक होता है पहला अधिक वर्षा के कारण दूसरा पौधों को अधिक समीप रोपने से पत्तियों पर बैंगनी रंग के धब्बे बन जाते हैं। परिणामस्वरूप पौधों की बढ़वार एवं विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
3. बैंगनी धब्बा(परपल ब्लॉच)

इसके लक्षण दिखाई देने पर मेनकोजेब (2.5 ग्रा./ली. पानी) का 10 दिन के अन्तराल से छिड़काव करें। इन फफूंदनाशी दवाओं में चिपकने वाले पदार्थ जैसे सैन्उो विट, ट्राइटोन या साधारण गोंद अवश्य मिला दें जिससे घोल पत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण हेतु चिपक सके।
खरीफ प्याज की प्रति हेक्टेयर उपज 250-300 क्विंटल तक मिल जाती है।

उपज

खेत की तैयारी

  • जुताई 2 बार,6 घण्टे प्रति जुताई /400/- प्रति घण्टा 
  • कल्टीवेटर एक बार, 6 घण्टे प्रति जूताई / 400/- प्रति घण्टा
  • खेत का समतलीकरण. क्यारियॉ. सिंचाई लालियॉ और मेड बनाना
4800.00
2400.00
2000.00


खाद एवं उर्वरक
  • गोबर की खाद/कम्पोस्ट 20 टन, / 2500/- प्रति टन
  • रासायनिक उर्वरक
  • बीज 15 किग्रा. / 650 प्रति किग्रा.
  • बीज बोना, पौधे तैयार करना, रोपाई 30 मजदूर /200/- प्रति मजदूर
  • खरपतवार नियंत्रण, सिचाई 20 / 200 प्रति मजदूर
  • निराई-गुडाई दो-दो बार, 30 मजदूर प्रति / 200/-मजदूर
  • पौघ संरक्षण उपाय, दवायें एवं मजदूरी
  • कंद छॅटाई, सफाई, भण्डारण, बोरे एवं भराई
  • विक्रय हेतू खेतों से बाजार तक परिवहन लागत
  • अन्य व्यय
50000.00
5200.00
9750.00
6000.00
4000.00
12000.00
5000.00
4000.00
5000.00
4000.00
5000.0
कुल लागत
1,19,150.00
उत्पादन 225 क्विं/हेक्टेयर,विक्रय मूल्य 1600/-प्रति क्विंटल
3,60,000.00
लाभ लागत अनुपात
1:3.02





 

मिट्टी परीक्षण के तरीके सीखे, स्टाल लगाकर किसानों को दी जानकारी किसान मेला



विश्व मृदा दिवस के मौके पर कृषि विभाग ने जिले के 1350 किसानों को हेल्थ स्वाइल कार्ड बांटा। इस दौरान स्टॉल लगाकर कृषि विभाग की योजनाअों के बारे में जानकारी दी गई। यही नहीं किसानों को मिट्टी परीक्षण के तरीके भी बताए गए। मेगा किसान मेले में जिलेभर से लगभग दो हजार किसान शामिल हुए। 

  विश्व मृदा दिवस के माैके पर कृषि विभाग ने ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर छेदीलाल एग्रीकल्चर कॉलेज में मेगा किसान मेले का आयोजन किया था। इस दौरान अतिथियों के हाथों 1350 किसान को स्वाइल हेल्थ कार्ड का वितरण कराया गया। कार्यक्रम के अतिथि बिलासपुर लाेकसभा के सांसद लखन लाल साहू ने कहा कि किसान अपने खेतों का मिट्टी का परीक्षण अवश्य कराएं। मिट्टी परीक्षण के बाद ही पता चलेगा कि उसमें कौन से कमी है। इस कमी को दूर करने के लिए आवश्यकता अनुसार खाद डाले और अधिक उत्पादन ले
उन्होंने कहा कि मृदा परीक्षण से मिट्टी के तत्वों की कमी या अधिकता की जानकारी मिलती है। इस तरह मिट्टी का स्वास्थ्य परीक्षण होता है। मिट्टी में जिन तत्वों की कमी है उसके अनुसार ही उर्वरक का उपयोग करने से अच्छी फसल होती है। केन्द्र सरकार ने आज के दिन को मृदा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है और इस दिवस पर कृषकों को जागरूक करने यह आयोजन किया गया है। बिल्हा की जनपद अध्यक्ष गीताजंलि कौशिक ने कहा कि जवान और किसान हमारे देश के लिए महत्वपूर्ण है। जवान सीमा में देश को सुरक्षित रखते है और किसान हमारे देश में नागरिकों के अनाज की पूर्ति करते है। उन्होंने किसानों से कृषि विभाग की योजनाओं का लाभ लें। अपने खेतों की मिट्टी परीक्षण अवश्य कराएं। जिला पंचायत सदस्य शुकवारा सालिक राम यादव और कृषक र| राघवेन्द्र चंदेल ने भी मिट्टी परीक्षण पर जोर दिया।

देर से आए अतिथि होता रहा इंतजार

योजनाओं की जानकारी देते रहे कलाकार

17 हजार के मिट्टी परीक्षण का टारगेट


कार्यक्रम सुबह 10 बजे शुरू होना था। समय पर कृषि विभाग के अफसर भी पहुंच गए थे, लेकिन अतिथि विलंब से पहुंचे। नगरीय प्रशासन मंत्री अमर अग्रवाल, कमिश्नर सोनमणि बोरा, कलेक्टर अन्बलगन पी समेत कई जनप्रतिनिधि और अफसर पहुंचे ही नहीं। पेंड्रा क्षेत्र के किसान राम सहाय, कोटा क्षेत्र के पुनीराम साहू, मस्तूरी के साधे लाल बंजारे समेत अन्य किसान सुबह से ही पहुंच गए थे।

कृषि विभाग की ओर से किसानों के लिए मनोरंजन की व्यवस्था की गई थी। लोक कलाकार गीत-संगीत से विभागी की योजनाओं के बारे में जानकारी दे रहे थे। दूर-दराज से आए किसान इसका लुत्फ उठाते रहे। लोक कलाकार गीत-संगीत के माध्यम से खेती से लेकर धान की मिंजाई की जानकारी देते रहे।

17 हजार किसानों के मिट्टी परीक्षण का टारगेट है। इसमें 10 हजार कृषकों का मिट्टी परीक्षण के लिए संग्रह किया गया है। विभाग की ओर से किसानों को जानकारी देने एवं जागरूक करने के लिए 28 स्टाल लगाए गए थे। यही नहीं पोषक तत्वों की कमी से फसलों पर पड़ने वाले प्रभावों को ग्राफ के माध्यम से बताया गया। किसानों को जैविक खाद और आधुनिक पद्धति से खेती करने पर जोर दिया गया।

60 हजार किसानों के मिट्टी परीक्षण का लक्ष्य


जिले में 2 लाख 66 हजार 380 कृषक है। जिनमें 3 वर्षों में 60 हजार किसानों का मिट्टी परीक्षण का लक्ष्य रखा गया है। इस वर्ष 17 हजार कृषकों का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। किसान मेले में 1350 किसानों को हेल्थ स्वाइल कार्ड दिया गया।’’ - जेएस काकोरिया, उपसंचालक, कृषि

भोपाल गैस त्रासदी को हुए पूरे तीस


  भोपाल गैस त्रासदी को हुए पूरे तीस साल हो गए हैं लेकिन यह त्रासदी आज भी हर दिन घटित हो रही है. दसियों हजार व्यक्तियों का जीवन इसके कारण नरक बन गया है.
भोपाल त्रासदी से पहले और बाद में मध्य प्रदेश सरकार और भारत सरकार ने जिस तरह से अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड के प्रति उदारता और पीड़ितों के प्रति निर्ममता दिखाई, उस पर यकीन करना मुश्किल है. हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बमों के कारण उत्पन्न स्थिति के बारे में कहा गया था कि जीवित बचे लोग मरने वालों से ईर्ष्या करेंगे क्योंकि उनका जीवन मौत से भी बदतर होगा. यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से हुए जहरीली गैस के रिसाव से 2 दिसंबर, 1984 की रात को हजारों लोगों मारे गए, लेकिन जो जिंदा हैं वे आज भी इस विभीषिका को भुगत रहे हैं. आज भी पैदा होने वाले अनेक शिशु जन्म से ही किसी न किसी गंभीर बीमारी या विकलांगता का शिकार हैं.
1984 में सरकार ने मरने वालों की संख्या 3,787 बताई थी. 2008 में मध्य प्रदेश सरकार की कार्य योजना में यह संख्या लगभग 16,000 दी गई थी. गैस पीड़ितों को मुआवजा देने वाली अदालत ने पीड़ितों की संख्या 5.73 लाख मानी थी. लेकिन गैस पीड़ितों के कल्याण के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता कहते हैं कि इस त्रासदी में कम से कम 23,000 व्यक्ति मारे गए हैं और लाखों व्यक्तियों का जीवन इसके कारण नरक बन गया है. उनके लिए यह त्रासदी कभी न खत्म होने वाले दुःस्वप्न की तरह है.
भारतीय राज्य की प्रतिक्रिया सचमुच स्तब्धकारी रही है. यूनियन कार्बाइड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी वारेन एंडरसन को गिरफ्तार किया गया, लेकिन रातोंरात उन्हें जमानत दिलवा कर सरकारी सुरक्षा में दिल्ली हवाई अड्डे लाया गया और वे आराम से अमेरिका पहुंच गए जबकि उन पर और उनकी कंपनी पर भारतीय कानून के तहत मुकदमा चलना चाहिए था. सरकार ने उनके प्रत्यावर्तन की भी कोई कोशिश नहीं की. यूनियन कार्बाइड के कुछ कर्मचारियों और अध्यक्ष केशव महेन्द्रा पर मुकदमा चला और उन्हें दो साल की सजा हुई, लेकिन उन्हें तत्काल जमानत पर रिहा भी कर दिया गया.
कानूनन यूनियन कार्बाइड पर कारखाने के रख-रखाव, बची हुई अनुपयोगी सामग्री को वहां से हटाने और कारखाने की सफाई की पूरी जिम्मेदारी थी. लेकिन स्थिति यह है कि आज भी बंद कारखाने में टनों जहरीले रसायन पड़े हुए हैं और वे भूमिगत पानी के साथ मिलकर आसपास रहने वाले लोगों की खाने-पीने की चीजों में जहर घोल रहे हैं. लेकिन सरकारी एजेंसियों को कोई परवाह नहीं है. तीस साल बाद भी कारखाने की सफाई नहीं की गई है क्योंकि अभी तक यह तय नहीं हो सका है कि यह किसकी जिम्मेदारी है, और इस बारे में मुकदमें आज भी अदालतों में हैं.
1989 में भारत सरकार ने यूनियन कार्बाइड के साथ अदालत के बाहर एक समझौता कर लिया जिसके तहत कंपनी ने 47 करोड़ डॉलर का मुआवजा देना स्वीकार किया. क्योंकि गैस त्रासदी से प्रभावित लोगों की संख्या लगभग छह लाख है, इसलिए अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रति व्यक्ति कितना मुआवजा मिल सका है. इसके अलावा त्रासदी के शिकार लोग आज भी अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं. यूनियन कार्बाइड कारखाने की सफाई न होने के कारण तीस साल बाद भी लगातार फैल रहे प्रदूषण के कारण अचानक होने वाले गर्भपात की तादाद में तीन गुनी बढ़ोतरी हो गई है. कैंसर की बीमारी के भी बढ़ने की खबर है.
क्या इस त्रासदी से किसी ने कोई सबक लिया? सरकार और उसकी एजेंसियों की संवेदनशून्यता और लापरवाही को देखते हुए तो ऐसा नहीं लगता कि किसी ने भी कोई सबक सीखा है. जब तक कारखाने और उसके आसपास के पूरे इलाके की वैज्ञानिक तरीके से सफाई नहीं की जाती और प्रदूषण को फैलने से रोका नहीं जाता, तब तक असहाय नागरिकों का जीवन उसी तरह बर्बाद होता रहेगा जैसा पिछले तीस सालों में होता आया है.

Friday, 6 November 2015

फसल उत्पादन

जलवायु संबंधी जानकारियां


इस भाग में जलवायु संबंधी विभिन्न जानकारियों को शामिल किया गया है।

सब्जियों की पौध तैयारी एवं उगाने की विधियां 


इस भाग में विभिन्न प्रकार से सब्जियों के पौध की तैयारी एवं उगाने की विधियों पर विशेष जानकारी उपलब्ध है |

कम वर्षा की परिस्थिति में फसल प्रबंधन 


इस भाग में कम वर्षा की परिस्थिति में फसलों के प्रबंधन की जानकारी प्रस्तुत की गई है।

कार्यप्रणालियों का संकुल 


इस भाग में विभिन्न प्रकार की फसलों के लिए विभिन्न क्षेत्रवार एवं जलवायु आदि के अनुरुप अपनाई जाने वाली कार्यप्रणालियों की जानकारी दी गई है।

फूलों की खेती 


इसमें फूलों की खेती के बारे में जानकारी दी गयी है|

किसानों के लिए सुझाव 


इस भाग में राज्यवार और फसल अनुसार किसानों के लिए उपयोगी सुझाव दिये गये हैं जिसमें और अधिक जानकारी जोड़कर उपयोगी बनाया जा सकता है।

झारखंड के लिए अनुशंसित कृषि तकनीक 


झारखंड के लिए अनुशंसित कृषि तकनीक

बैंगन के एकीकृत कीट प्रबंधन के लिए रणनीतियाँ 


यहाँ बैंगन के एकीकृत कीट प्रबंधन की रणनीतियो के विषय मैं वर्णन किया गया है.

व्यवसायिक फसलों की खेती 


इस भाग में व्यवसायिक फसलों की जानकारी को महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया है जिससे इसकी खेती से जुड़े किसान और अन्य सभी लाभान्वित हो सकें।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती 


इस लेख में प्राकृतिक खेती के ऊपर आलेख प्रस्तुत है।

फलों की खेती 


इस भाग में विभिन्न फलों की जाने वाली खेती और उस खेती का लाभदायक बनाने वालों किसानों से परिचय कराने का प्रयास किया गया है।

उत्पादन प्रौद्योगिकी 


इस भाग में फसल उत्पादन से जुड़ी जानकारी रोचक तरीके से प्रस्तुत की गई है।

खाद्य सुरक्षा मानक और कोडेक्स 


भारत सरकार द्वारा लागू किये गये सभी सुरक्षा नियमों के पालन की जानकारी यहाँ दी गयी है।

संग्रहित अनाज के कीट प्रबंधन के लिए गैजेट्स 


संग्रहित अनाज को कीट से कैसे दूर रखा जाये, इसके ऊपर एक लेख यहाँ प्रस्तुत है।

आम, केले और पपीते का एक समान पकना 


किस प्रकार आम, केले और पपीता को एक सामान पकाया जा सकता है, बिना किसी केमिकल के इस्तेमाल के, उसकी जानकारी यहाँ दी गयी है|

बेर की गोली बनाना 


इस लेख में बेर के फल से गोली बनाने की प्रक्रिया को बताया गया है|

फसलोपरांत प्रौद्योगिकी 


इस भाग में फल्सोपरांत अनाजों, दालों, फलों, और सब्जियों से संबंधित नयी प्रोद्यिगिकी का वर्णन किया गया है. किसानों के लिए महत्वपूर्ण कोल्ड स्टोरेज की मौजूदा सुविधा और देश के खाद्य सुरक्षा से जुड़े मानकों आदि का भी विश्लेषण है

केले का उत्तक संवर्धन- उत्पादन तकनीक 


नए तकनीक से केले का उत्तम उत्पादन जिससे किसान लाभान्वित हों, उसका यहाँ उल्लेख किया गया है।

उत्तर-पूर्व भारत के लिए प्रौद्योगिकी


उत्तर- पूर्व भारत में प्रचलित फसल की प्रौद्योगिकी का इस भाग में उल्लेख किया गया है।

समन्वित कीट प्रबंधन के अवयव 


इस लेख में समन्वित कीट प्रबंधन के अवयवों की जानकरी पाठकों को दी गयी है|
 

फसल उत्पादन की उन्नत कृषि प्रणाली 


इस लेख में फसल उत्पादन की उन्नत कृषि प्रणली, जो आज देश में प्रचलित है, की जानकारी उठा सकते है।

छाया घर (शेड हाउस) 


इस लेख में छाया घर पर एक विस्तृत लेख है जिससे किसान लाभ उठा सकते है।

उत्पादन प्रौद्योगिकी 


यह भाग सफलतापूर्वक खेती के उत्पादन सहित बीज उपचार, पोषक तत्व प्रबंधन, सिंचाई प्रबंधन, नियंत्रित वातावरण में उत्पादन, टिशू कल्चर आदि की जानकारी देता है।

छिड़काव सिंचाई प्रणाली 


किसानों के मदद के लिए इस लेख में छिडकाव सिंचाई प्रणाली पर प्रकाश डाला गया है|

ड्रिप सिंचाई प्रणाली 


इस लेख में ड्रिप सिंचाई प्रणाली पर विस्तृत जानकारी उपलब्ध करायी गयी है।

धनिया स्प्लिटर 


इस लेख में धनिया स्प्लिटर पर एक आलेख प्रस्तुत किया गया है|

खेती के उपकरण 


मिट्टी जाँच: महत्व एवं तकनीक 


इस लेख में बीज बोने से पहली की प्रक्रिया यानि मिट्टी की जांच, उसके तकनीक ओर महत्वों के बारे में बताया गया है|

कृषि आगत 


इस भाग में विभिन्न आदानों जैसे बीज,रोपण सामग्री, उर्वरक, कीटनाशकों, जैव उर्वरक, जैविक खाद, प्राकृतिक कीटनाशकों की तैयारी आदि की उपलब्धता और प्रबंधन का ध्यान रखने से संबंधित जानकारी दी जाती है।
  

गेंहू की सुरक्षा

खरपतवार नियंत्रण

गेहूं की बीज फसल में रबी मौसम के लगभग सभी खरपतवारों जैसे गजरी, बथूआ, प्याजी, खरतुआ, हिरनखुरी, चटरीमटरी, जंगली गाजर, सेंजी, अंकराअंकरी, कृष्णनील, गेहूँसा और जंगली जई वैगरह की समस्या रहती है| आर्जीमोन (सत्यानाशी), हिरनखुरी, कृष्णनील, गजरी, प्याजी वैगरह की रोकथाम के लिए 2-4 डी सोडियम साल्ट ( 80 फीसदी डब्ल्यूपी) को 625 ग्राम मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के 35 से 40 दिनों के अंदर 1000 लीटर पानी में घोल बना कर इस्तेमाल करें|
संकरी पट्टी वाले खरपतवारों जैसे गेहूँसा व जंगली जई की रोकथाम के लिए आई सोप्रोटयूरान (75 फीसदी) की 1 किलोग्राम या पैंदीमैथिलीन (30 फीसदी) की 3.3 लीटर या फिनाक्सिप्राप (10 ईसी) की 1 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से पहली सिंचाई के 1 हफ्ते बाद (बोआई के 30 से 35 दिनों के अंदर) 1000 लीटर पानी में घोल कर इस्तेमाल करना चाहिए|
जहाँ चौड़ी पत्ती वाले व संकरी पत्ती वाले यानीं दोनों तरह के खरपतवार हों, वहाँ 2-4 डी और आइसोप्रोटयूरान मिलकर प्रयोग करें| पैंडीमैथिलिन का प्रयोग बोआई के बाद लेकिन जमाव से पहले करें|

बीज शोधन

गेहूं की फसल में दुर्गन्धयुक्त कंदूवा, करनाल बंट, अनावृत कंडूआ और गेहूं रोगों का प्रारंभिक संक्रमण बीज या भूमि या दोनों के माध्यम से होआ है| रोग कारक फफूंदी, जीवाणू व सूत्रकृमि बीज की सतह पर, सतह के नीचे या बीज के अंदर प्रसूप्तावस्था में मौजूद रहते हैं| इसलिए बीज उत्पादन के लिए शोधन किए उपचारित बीज ही इस्तेमाल करने चाहिए| यदि उपचारित बीज की उपलब्धता न हो, तो निम्न प्रकार से बीजोपचार कर के ही बोआई करें-
करनाल बंट दूषित बीज और जमीन से फैलता है| इस की रोकथाम के लिए ढाई ग्राम थीरम प्रति किलोग्राम बीज की दर से इस्तेमाल करें|
अनावृत कंडूआ रोग में बालियों में दानों के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता है और बाद में रोग जनक के तमाम बीजाणु (काला चूर्ण) हवा में फैलते हैं और स्वस्थ बालियों में फूल आते समय उन का संक्रमण करतें हैं| इस की रोकथाम के लिए कर्बडाजिम (50 फीसदी) या कार्बाक्सिन (75 फीसदी) की ढाई ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज दर की दर से ले कर बीज को शोधित कर के बोआई करनी चाहिए|
बीमार पौधों को देखते ही सावधानी से उखाड़ने के बाद जला कर खत्म कर देना चाहिए| मई जून के महीनों में कड़ी धुप वाले दिन में बीजों को 4 घंटे ठंडे पानी में भिगो कर पक्के फर्श पर अच्छी तरह सुखा कर अगले साल बोने के लिए भंडारित कर लेना चाहिए|
गेहूं का ईयर कौकिल रोग (सेंहू रोग) ‘एग्विना ट्रिटीसाई’ नामक सूत्रकृमि द्वारा होता है| इस रोग से पौधों की पत्तियों मूड़ कर सिकुड़ जाती हैं| इस रोग से पौधों की पत्तियाँ मुड़ कर सिकुड़ जाती हैं| इस के असर वाले पौधे छोटे रह जाते हैं और उन में स्वस्थ पौधों के मुकाबले ज्यादा टहनियां निकलती हैं| रोगग्रस्त बालियाँ ज्यादा टहनियां निकलती हैं| रोगग्रस्त गलियां छोटी और फैली हुई होती हैं और इन में दानों की जगह भूरे या काले रंग की गांठे बन जाती हैं, जिन में सूत्रकृमि रहते हैं| इस रोग की रोकथाम के लिए ईयर कौकिल गांठमुक्त बीज का इस्तेमाल करें| ईयर कौकिल गांठ मिश्रित बीज को कुछ समय के लिए 2 फीसदी नमक के घोल में डूबोएँ (200 ग्राम नमक को 10 लीटर पानी में मिलाकर) ताकि सूत्रकृमि ग्रसित काली गांठे हल्की होने को निकाल कर खत्म कर दें| बीज को साफ पानी से 2-3 बार धो कर सुखा लेने के बाद ही बोआई में प्रयोग करें|

भूमि शोधन

असिंचित क्षेत्रों में भूमिगत कीटों जैसे दीमक का प्रकोप ज्यादा होता है, इसलिए इन्हें खत्म करने के लिए खेत की आखिरी जुताई व खड़ी फसल पर प्रकोप होने पर सिंचाई के साथ खेत में क्लोरोपाइरिफास (20 ईसी) की 3 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें| बोआई से पहले दीमक की रोकथाम के लिए क्लोरोपाइरीफास ( 20 ईसी) की 4 मिलीलीटर मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से ले कर बीज उपचारित कर के बोआई करें|

सरसों की खेती: कम लागत, उपज भरपूर, लाभ मिलने का अवसर भी


लखनऊ। कुछ दिनों पहले किसानों को सूखे की मार झेलनी पड़ी थी। अब वे धान की फसल के खराब होने से दिक्कत में हैं। वजह, बरसात नहीं हुई। सरकारीतंत्र भी इतना लापरवाह है कि नहरें सूखी गई। किसानों के खेतों की फसलों को नहरों से सिंचाई के लिए मिलने वाले पानी के रूप में संजीवनी नहीं मिल सकी। अब या तो फसल सूख चुकी है या फिर उनमें बालियां ही नहीं है।
किसान धान की फसल न होने के मलाल को थोड़ा कम कर सकते हैं। हुई हानि की भरपाई की भी कुछ हद तक हो जाएगी, वह भी थोड़ी सी सिंचाई में। किसानों को समय से सरसों की खेती करनी होगी। आइए जानें इसके लिए जरूरी कदम क्या हो सकते हैं?
यह भी जानें
कृषि वैज्ञानिक डाॅ. संजय कुमार द्विवेदी की मानें तो सरसों रबी के तिलहन की फसल है। सीमित सिंचाई में भी इसकी भरपूर पैदावार होती है। फूल आने से पहले और दाना भरने के दौरान हल्की सिंचाई करें। समय से बुआई, संतुलित उर्वरक के प्रयोग और रोग नियंत्रण कर, इस फसल से एक हेक्टेअर में 25 से 30 कुंतल उत्पादन ले सकते हैं।
मध्य अक्टूबर की खेती अधिक लाभकारी
अगैती बुआई (मध्य अक्टूबर) लाभकारी है। ऐसा करने से फसल को क्षति पहुंचाने वाले माहू कीट के प्रकोप की संभावना कम होती है। प्रति हेक्टेअर 5-6 किग्रा बीज पर्याप्त है। बुआई के पूर्व बीजशोधन करें। एक किग्रा बीज को 2.5 ग्राम थीरम और 1.5 ग्राम मैटालिक्स से शोधित करें। सफेद गेरुई तथा तुलसिता रोग नहीं होगा।
ऐसे करें खेत की तैयारी
2-3 सामान्य जुताई करें। रोटावेटर की एक जुताई में भी खेत तैयार हो जाएगा। नमी जांचे और अगर नमी कम है तो पलेवा लगाने के बाद बुवाई करें। बेहतर जमाव होगा। मिट्टी जांच के बाद उर्वरकों का प्रयोग करें। इससे अनावश्यक दी जाने वो उर्वरकों से बचा जा सकेगा। लागत भी कम होगी।
क्या हो उर्वरक की मात्रा
सामान्य तौर पर एक हेक्टेअर के लिए 120 किग्रा नाइट्रोजन और 40-40 किग्रा पोटाश व फास्फेट पर्याप्त है। फास्फोरस का प्रयोग सिंगल सुपर फास्फेट (एसएसपी) के रूप में बेहतर होगा। बेहतर उपज के लिए एक हेक्टेअर में 40 किग्रा गंधक अलग से डालें। लेकिन यह तक करें जब एसएसपी का प्रयोग न किया गया हो। नाइट्रोजन की आधी और अन्य उर्वरकों की पूरी मात्रा खेत की अंतिम तैयारी के समय डालें। शेष नाइट्रोजन माह भर बाद होने वाली पहली सिंचाई में दें।
उन्नत प्रजातियां
नरेंद्र राई, कांती, उर्वशी, माया, वैभव, आशीर्वाद, वरुणा या टी 59, बसंती, रोहिणी, वरदान, कृष्णा व पूसा बोल्ड प्रमुख प्रजातियां हैं। कुछ निजी कंपनियों के बीज भी बेहतर उपज देने वाली बताई जा रहीं हैं।
बेहतर बाजार भाव मिलने की उम्मीद
पिछले सीजन में बेमौसम बारिश और ओले से फसल खराब हुई है। इस वजह से तक सात महीने के भीतर सरसों तेल के दाम में तकरीबन 45 फीसदी की उछाल आई है। ऐसे में उन किसानों को लाभ मिलने की ज्यादा संभावनाएं हैं जिनकी फसल पहले तैयार हागी।

समस्या – समाधान


समस्या- क्या खड़ी फसल में डीएपी का उपयोग कर सकते हैं।
– माणकचंद मोदी, सारंगपुर
समाधान-

1. डीएपी का पूरा नाम डाई अमोनियम फास्फेट है इससे पौधों को दो महत्वपूर्ण तत्व अमोनियम से नत्रजन तथा फास्फेट से फास्फोरस मिलता है।
2. किसी भी खाद में जिसमें फास्फोरस रहता है को खड़ी फसल में नहीं देना चाहिए।
3. फास्फोरस मिट्टी के संपर्क में आने पर मिट्टी के कणों में स्थिर हो जाता है। इसकी पानी में घुलनशीलता कम होने के कारण यह देर से तथा धीरे-धीरे घुलता है। इस कारण यह पौधों को देर से उपलब्ध हो पाता है। इस कारण खड़ी फसल में फास्फोरस वाली खाद नहीं दी जानी चाहिए।
4. फास्फोरस वाली खाद का उपयोग आधार खाद के रूप में बीज बोने के पूर्ण या समय पर करना चाहिए। यदि यह खाद बीज के नीचे दी जाये तो वह पौधों को सरलता से उपलब्ध हो जाती है।
5
समस्या- कपास में मिलीबग का नियंत्रण कैसे करें।
– भागवत सिंह हाड़ा, होशंगाबाद
समाधान-

कपास में मिलीबग का प्रकोप प्रतिवर्ष बढ़ता चला जा रहा है। मिलीबग के शरीर का ऊपरी भाग मोम के पदार्थ से ढका रहता है। जिस कारण सामान्य तरीके से छिड़काव करने से इसका उचित नियंत्रण नहीं मिल पाता है। कई कीटों के नियंत्रण के लिये कीटनाशक के चुनाव से छिड़कने का समय व छिड़कने का तरीका अधिक महत्वपूर्ण रहता है। इन कीटों में मिलीबग भी सम्मिलित है।
द्य नियंत्रण के लिये स्पर्श कीटनाशक जैसे ट्राइजोफॉस का उपयोग करें।
द्य आपने देखा होगा कि जैसे ही हम छिड़काव आरंभ करते है। इसके शिशु नीचे गिर जाते हंै। और कुछ समय बाद फिर से रेंग कर पौधों में चढ़ जाते हैं।
द्य इसके उचित नियंत्रण के लिये पहले ऐेसे पौधों में छिड़काव करें जिनमें मिलीबग का प्रकोप कम हो। फिर भूमि पर छिड़काव करें अंत में जहां मिलीबग समूह में हो वहां छिड़काव करें। इससे शिशु जो जमीन में गिरकर फिर पौधों में रेंग कर चढ़ जाते हंै उनका भी नियंत्रण हो जायेगा।
6
समस्या- धान लगाई है वर्षा जल के अतिरेक से क्या हानि हो सकती है कृपया बतायें उचित जल प्रबंधन से और क्या हो सकता है।
– घनश्याम दास, बालाघाट
समाधान -

वैसे तो इस वर्ष की वर्षा से फसलों को हानि पहुंची है परंतु अन्य फसलों की तुलना में धान को कम हानि होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि धान की फसल को सतत जल की आवश्यकता रहती है हर फसलों में उचित जल प्रबंधन से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है। धान की फसल में जल प्रबंध करके रसचूसक कीट जैसे भूरा माहो, हरा माहो, सफेद माहो एवं गंगई का नियंत्रण सरलता से किया जा सकता है। जल की उपलब्धता होने पर 5-7 दिन के अंतर से 1 या 2 बार पानी खोलने से उक्त कीटों के अंडे खेत के बाहर हो जाते हंै और प्रारंभिक आक्रमण पर अंकुश लगाया जा सकता है। अन्य फसलों में नालियां बना कर अतिरिक्त जल का निथार बहुत जरूरी होगा।
7
समस्या – मिर्च में माहो का प्रकोप हो गया है नियंत्रण के उपाय बतायें।
– रणवीर सिंह, भिंड
समाधान-

माहो अनेकों फसलों पर कोमल पत्तों का रसचूसकर बहुत हानि पहुंचाता है। रस चूसने के दौरान एक प्रकार का मीठा रस पत्तियों पर गिरता है। जिस पर हवा में उपलब्ध सूटीमोल्ड पनपने लगती है और दोहरा नुकसान करती है। आप निम्न उपाय करें-
1. कीट प्रकोप की प्रारंभिक अवस्था में नीमतेल 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
2. अधिक प्रकोप दिखने पर डायमिथियेट 30 ई.सी. की 2 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 10 दिनों के अंतर से दो छिड़काव करें। अथवा एफीसेट 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 10 दिनों के अंतर से दो छिड़काव करें। अथवा एसीडाक्लोप्रिड 18.5 एस.एल. 5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर एक छिड़काव करें।
8
समस्या- कृषि कार्य हेतु यांत्रिकी संबंधित जानकारी जिसमें अनुदान के बारे में विशेष रूप से उल्लेख हो ऐसी किताब कहां मिलेगी।
– एस.आर. नागौर, इंदौर
समाधान-

आप कृषि यंत्र तथा उनके क्रम के बारे में संपूर्ण जानकारी की किताब चाहते हैं। यदि आप हमारे कृषक जगत के सदस्य हो तो आपके पास कृषक जगत द्वारा प्रकाशित डायरी होगी उसमें अन्य विभागों के अलावा कृषि यंत्रों और अनुदान की भी जानकारी दी गई है। आप कृषक जगत भोपाल के पते पर रु. 25/- का मनीआर्डर कर किसानों को दी जाने वाली सुविधाएं मंगा सकते हैं।